भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 34, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 34

आजगाम ततो मृत्युः पन्नगं चाब्रवीदिदम् ॥ ४९ ॥
भीष्मजी कहते हैं— राजन्! मृत्युकी प्रेरणासे बालकको डँसनेवाला सर्प जब बारंबार अपनेको निर्दोष और मृत्युको दोषी बताने लगा तब मृत्यु देवता भी वहाँ आ पहुँचा और सर्पसे इस प्रकार बोला ॥ ४९ ॥

मृत्‍युरुवाच

प्रचोदितोऽहं कालेन पन्नग त्वामचूचुदम् ।
विनाशहेतुर्नास्य त्वमहं न प्राणिनः शिशोः ॥ ५० ॥
मृत्युने कहा— सर्प! कालसे प्रेरित होकर ही मैंने तुझे इस बालकको डँसनेके लिये प्रेरणा दी थी; अतः इस शिशु प्राणीके विनाशमें न तो तू कारण है और न मैं ही कारण हूँ ॥ ५० ॥

यथा वायुर्जलधरान् विकर्षति ततस्ततः ।
तद्वज्जलदवत् सर्प कालस्याहं वशानुगः ॥ ५१ ॥
सर्प! जैसे हवा बादलोंको इधर-उधर उड़ा ले जाती है, उन बादलोंकी ही भाँति मैं भी कालके वशमें हूँ ॥ ५१ ॥

सात्त्विका राजसाश्चैव तामसा ये च केचन ।
भावाः कालात्मकाः सर्वे प्रवर्तन्ते ह जन्तुषु ॥ ५२ ॥
सात्त्विक, राजस और तामस जितने भी भाव हैं, वे सब कालात्मक हैं और कालकी ही प्रेरणासे प्राणियोंको प्राप्त होते हैं ॥ ५२ ॥

जङ्गमाः स्थावराश्चैव दिवि वा यदि वा भुवि ।
सर्वे कालात्मकाः सर्प कालात्मकमिदं जगत् ॥ ५३ ॥
सर्प! पृथ्वी अथवा स्वर्गलोकमें जितने भी स्थावर-जङ्गम पदार्थ हैं, वे सभी कालके अधीन हैं। यह सारा जगत् ही कालस्वरूप है ॥ ५३ ॥

प्रवृत्तयश्च लोकेऽस्मिंस्तथैव च निवृत्तयः ।
तासां विकृतयो याश्च सर्वं कालात्मकं स्मृतम् ॥ ५४ ॥
इस लोकमें जितने प्रकारकी प्रवृत्ति-निवृत्ति तथा उनकी विकृतियाँ (फल) हैं, ये सब कालके ही स्वरूप हैं ॥ ५४ ॥

आदित्यश्चन्द्रमा विष्णुरापो वायुः शतक्रतुः ।
अग्निःखं पृथिवी मित्रः पर्जन्यो वसवोऽदितिः ॥ ५५ ॥
सरितः सागराश्चैव भावाभावौ च पन्नग ।
सर्वे कालेन सृज्यन्ते ह्रियन्ते च पुनः पुनः ॥ ५६ ॥
पन्नग! सूर्य, चन्द्रमा, जल, वायु, इन्द्र, अग्नि, आकाश, पृथ्वी, मित्र, पर्जन्य, वसु, अदिति, नदी, समुद्र तथा भाव और अभाव—ये सभी कालके द्वारा ही रचे जाते हैं और