महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 364, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंसकता ।। ६० ।। वाङ्मनःकर्मजैर्ग्रस्तः पापैरपि पुमानिह । वीक्ष्य गङ्गां भवेत् पूतो अत्र मे नास्ति संशयः ।। ६१ ।। मन, वाणी और क्रियाद्वारा होनेवाले पापोंसे ग्रस्त मनुष्य भी गंगाजीका दर्शन करने मात्रसे पवित्र हो जाता है—इसमें मुझे संशय नहीं है ।। ६१ ।। सप्तावरान् सप्त परान् पितॄंस्तेभ्यश्च ये परे । पुमांस्तारयते गङ्गां वीक्ष्य स्पृष्ट्वावगाह्य च ।। ६२ ।। गंगाजीका दर्शन, उनके जलका स्पर्श तथा उस जलके भीतर स्नान करके मनुष्य सात पीढ़ी पहलेके पूर्वजोंका और सात पीढ़ी आगे होनेवाली संतानोंका तथा इनसे भी ऊपरके पितरों और संतानोंका उद्धार कर देता है ।। ६२ ।। श्रुताभिलषिता पीता स्पृष्टा दृष्टावगाहिता । गङ्गा तारयते नृणामुभौ वंशौ विशेषतः ।। ६३ ।। जो पुरुष गंगाजीका माहात्म्य सुनता, उनके तटपर जानेकी अभिलाषा रखता, उनका दर्शन करता, जल पीता, स्पर्श करता तथा उनके भीतर गोते लगाता है, उसके दोनों कुलोंका भगवती गंगा विशेषरूपसे उद्धार कर देती हैं ।। ६३ ।। दर्शनात् स्पर्शनात् पानात् तथा गङ्गेति कीर्तनात् । पुनात्यपुण्यान् पुरुषान् शतशोऽथ सहस्रशः ।। ६४ ।। गंगाजी अपने दर्शन, स्पर्श, जलपान तथा अपने गंगानामके कीर्तनसे सैकड़ों और हजारों पापियोंको तार देती हैं ।। ६४ ।। य इच्छेत् सफलं जन्म जीवितं श्रुतमेव च । स पितॄंस्तर्पयेद् गाङ्गमभिगम्य सुरांस्तथा ।। ६५ ।। जो अपने जन्म, जीवन और वेदाध्ययनको सफल बनाना चाहता हो वह गंगाजीके पास जाकर उनके जलसे देवताओं तथा पितरोंका तर्पण करे ।। ६५ ।। न सुतैर्न च वित्तेन कर्मणा न च तत्फलम् । प्राप्नुयात् पुरुषोऽत्यन्तं गङ्गां प्राप्य यदाप्नुयात् ।। ६६ ।। मनुष्य गंगास्नान करके जिस अक्षय फलको प्राप्त करता है उसे पुत्रोंसे, धनसे तथा किसी कर्मसे भी नहीं पा सकता ।। ६६ ।। जात्यन्धैरिह तुल्यास्ते मृतैः पङ्गुभिरेव च । समर्था ये न पश्यन्ति गङ्गां पुण्यजलां शिवाम् ।। ६७ ।। जो सामर्थ्य होते हुए भी पवित्र जलवाली कल्याणमयी गंगाका दर्शन नहीं करते वे जन्मके अन्धों, पंगुओं और मुर्दोंके समान हैं ।। ६७ ।। भूतभव्यभविष्यज्ञैर्महर्षिभिरुपस्थिताम् । देवैः सेन्द्रैश्च को गङ्गां नोपसेवेत मानवः ।। ६८ ।।