महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 370, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंउस्रां पुषां मिषतीं विश्वभोज्या- मिरावतीं धारिणीं भूधराणाम् । शिष्टाश्रयाममृतां ब्रह्मकान्तां गङ्गां श्रयेदात्मवान् सिद्धिकामः ॥ ९५ ॥ जो अमृतमय दूध देनेवाली, गौके समान सबको पुष्ट करनेवाली, सब कुछ देखनेवाली, सम्पूर्ण जगत्के उपयोगमें आनेवाली, अन्न देनेवाली तथा पर्वतोंको धारण करनेवाली हैं, श्रेष्ठ पुरुष जिनका आश्रय लेते हैं और जिन्हें ब्रह्माजी भी प्राप्त करना चाहते हैं; तथा जो अमृतस्वरूप हैं, उन भगवती गङ्गाजीका सिद्धिकामी जितात्मा पुरुषोंको अवश्य आश्रय लेना चाहिये ॥ ९५ ॥
प्रसाद्य देवान् सविभून् समस्तान् भगीरथस्तपसोग्रेण गङ्गाम् । गामानयत् तामभिगम्य शश्वत् पुंसां भयं नेह चामुत्र विद्यात् ॥ ९६ ॥ राजा भगीरथ अपनी उग्र तपस्यासे भगवान् शंकरसहित सम्पूर्ण देवताओंको प्रसन्न करके गङ्गाजीको इस पृथ्वीपर ले आये। उनकी शरणमें जानेसे मनुष्यको इहलोक और परलोकमें भय नहीं रहता ॥ ९६ ॥
उदाहृतः सर्वथा ते गुणानां मयैकदेशः प्रसमीक्ष्य बुद्ध्या । शक्तिर्न मे काचिदिहास्ति वक्तुं गुणान् सर्वान् परिमातुं तथैव ॥ ९७ ॥ ब्रह्मन्! मैंने अपनी बुद्धिसे सर्वथा विचारकर यहाँ गङ्गाजीके गुणोंका एक अंशमात्र बताया है। मुझमें कोई इतनी शक्ति नहीं है कि मैं यहाँ उनके सम्पूर्ण गुणोंका वर्णन कर सकूँ ॥ ९७ ॥
मेरोः समुद्रस्य च सर्वयत्नैः संख्योपलानामुदकस्य वापि । शक्यं वक्तुं नेह गङ्गाजलानां गुणाख्यानं परिमातुं तथैव ॥ ९८ ॥ कदाचित् सब प्रकारके यत्न करनेसे मेरु गिरिके प्रस्तरकणों और समुद्रके जलविन्दुओँकी गणना की जा सके; परंतु यहाँ गङ्गाजलके गुणोंका वर्णन तथा गणना करना कदापि सम्भव नहीं है ॥ ९८ ॥
तस्मादेतान् परया श्रद्धयोक्तान् गुणान् सर्वान् जाह्नवीयात् सदैव । भवेद् वाचा मनसा कर्मणा च