भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 372, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 372

कुन्तीनन्दन! इसी प्रकार तुम भी पराभक्तिके साथ सदा गंगाजीकी उपासना करो। इससे तुम्हें उत्तम सिद्धि प्राप्त होगी ॥ १०४ ॥

वैशम्पायन उवाच

श्रुत्वेतिहासं भीष्मोक्तं गङ्गायाः स्तवसंयुतम् ।
युधिष्ठिरः परां प्रीतिमगच्छद् भ्रातृभिः सह ॥ १०५ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! भीष्मजीके द्वारा कहे हुए श्रीगंगाजीकी स्तुतिसे युक्त इस इतिहासको सुनकर भाइयोंसहित राजा युधिष्ठिरको बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ १०५ ॥

इतिहासमिमं पुण्यं शृणुयाद् यः पठेत् वा ।
गङ्गायाः स्तवसंयुक्तं स मुच्येत् सर्वकिल्बिषैः ॥ १०६ ॥
जो गङ्गाजीके स्तवनसे युक्त इस पवित्र इतिहासका श्रवण अथवा पाठ करेगा वह समस्त पापोंसे मुक्त हो जायगा ॥ १०६ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि गङ्गामाहात्म्यकथने
षड्विंशोऽध्यायः ॥ २६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें गंगाजीके माहात्म्यका वर्णनविषयक छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २६ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल १०७ श्लोक हैं)