भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 379, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 379

पुल्कसः पापयोनिर्वा यः कश्चिदिह लक्ष्यते । स तस्यामेव सुचिरं मतङ्ग परिवर्तते ॥ ७ ॥ 'मतंग! पुल्कस या जो कोई भी पापयोनि पुरुष यहाँ दिखायी देता है वह सुदीर्घकालतक अपनी उसी योनिमें चक्कर लगाता रहता है ॥ ७ ॥ ततो दशशते काले लभते शूद्रतामपि । शूद्रयोनावपि ततो बहुशः परिवर्तते ॥ ८ ॥ 'तदनन्तर एक हजार वर्ष बीतनेपर वह चाण्डाल या पुल्कस शूद्रयोनिमें जन्म लेता है और उसमें भी अनेक जन्मोंतक चक्कर लगाता रहता है ॥ ८ ॥ ततस्त्रिंशद्गुणे काले लभते वैश्यतामपि । वैश्यतायां चिरं कालं तत्रैव परिवर्तते ॥ ९ ॥ 'तत्पश्चात् तीसगुना समय बीतनेपर वह वैश्य-योनिमें आता है और चिरकालतक उसीमें चक्कर काटता रहता है ॥ ९ ॥ ततः षष्टिगुणे काले राजन्यो नाम जायते । ततः षष्टिगुणे काले लभते ब्रह्मबन्धुताम् ॥ १० ॥ इसके बाद साठगुना समय बीतनेपर वह क्षत्रियकी योनिमें जन्म लेता है। फिर उससे भी साठगुना समय बीतनेपर वह गिरे हुए ब्राह्मणके घरमें जन्म लेता है ॥ १० ॥ ब्रह्मबन्धुश्चिरं कालं ततस्तु परिवर्तते । ततस्तु द्विशते काले लभते काण्डपृष्ठताम् ॥ ११ ॥ 'दीर्घकालतक ब्राह्मणाधम रहकर जब उसकी अवस्था परिवर्तित होती है तब वह अस्त्र-शस्त्रोंसे जीविका चलानेवाले ब्राह्मणके यहाँ जन्म लेता है ॥ ११ ॥ काण्डपृष्ठिश्चिरं कालं तत्रैव परिवर्तते । ततस्तु त्रिशते काले लभते जपतामपि ॥ १२ ॥ फिर चिरकालतक वह उसी योनिमें पड़ा रहता है। तदनन्तर तीन सौ वर्षका समय व्यतीत होनेपर वह गायत्री-मात्रका जप करनेवाले ब्राह्मणके यहाँ जन्म लेता है ॥ १२ ॥ तं च प्राप्य चिरं कालं तत्रैव परिवर्तते । ततश्चतुःशते काले श्रोत्रियो नाम जायते । श्रोत्रियत्वे चिरं कालं तत्रैव परिवर्तते ॥ १३ ॥ उस जन्मको पाकर वह चिरकालतक उसी योनिमें जन्मता-मरता रहता है। फिर चार सौ वर्षोंका समय व्यतीत होनेपर वह श्रोत्रिय (वेदवेत्ता) ब्राह्मणके कुलमें जन्म लेता है और उसी कुलमें चिरकालतक उसका आवागमन होता रहता है ॥ १३ ॥ तदेवं शोकहर्षौ तु कामद्वेषौ च पुत्रक । अतिमानातिवादौ च प्रविशेते द्विजाधमम् ॥ १४ ॥