महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 384, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंनूनं दैवं न शक्यं हि पौरुषेणातिवर्तितुम् ॥ १९ ॥ यदर्थं यत्नवानेव न लभे विप्रतां विभो । प्रभो! निश्चय ही पुरुषार्थके द्वारा दैवका उल्लंघन नहीं किया जा सकता; क्योंकि मैं जिसके लिये ऐसा प्रयत्नशील हूँ उस ब्राह्मणत्वको नहीं उपलब्ध कर पाता हूँ ॥ १९½ ॥
एवंगते तु धर्मज्ञ दातुमर्हसि मे वरम् ॥ २० ॥ यदि तेऽहमनुग्राह्यः किंचिद् वा सुकृतं मम । धर्मज्ञ देवराज! यदि ऐसी अवस्थामें मैं आपका कृपापात्र हूँ अथवा यदि मेरा कुछ भी पुण्य शेष हो तो आप मुझे वर प्रदान कीजिये ॥ २०½ ॥
वैशम्पायन उवाच
वृणीष्वेति तदा प्राह ततस्तं बलवृत्रहा ॥ २१ ॥ चोदितस्तु महेन्द्रेण मतङ्गः प्राब्रवीदिदम् । वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तब बल और वृत्रासुरको मारनेवाले इन्द्रने मतङ्गसे कहा—'तुम मुझसे वर माँगो।' महेन्द्रसे प्रेरित होकर मतङ्गने इस प्रकार कहा — ॥ २१½ ॥
यथा कामविहारी स्यां कामरूपी विहङ्गमः ॥ २२ ॥ ब्रह्मक्षत्राविरोधेन पूजां च प्राप्नुयामहम् । यथा ममाक्षया कीर्तिर्भवेच्चापि पुरंदर ॥ २३ ॥ कर्तुमर्हसि तद् देव शिरसा त्वां प्रसादये । देव पुरंदर! आप ऐसी कृपा करें जिससे मैं इच्छानुसार विचरनेवाला तथा अपनी इच्छाके अनुसार रूप धारण करनेवाला आकाशचारी देवता होऊँ। ब्राह्मण और क्षत्रियोंके विरोधसे रहित हो मैं सर्वत्र पूजा एवं सत्कार प्राप्त करूँ तथा मेरी अक्षय कीर्तिका विस्तार हो। मैं आपके चरणोंमें मस्तक रखकर आपकी प्रसन्नता चाहता हूँ। आप मेरी इस प्रार्थनाको सफल बनाइये ॥
शक्र उवाच
छन्दोदेव इति ख्यातः स्त्रीणां पूज्यो भविष्यसि ॥ २४ ॥ कीर्तिश्च तेऽतुला वत्स त्रिषु लोकेषु यास्यति । इन्द्रने कहा—वत्स! तुम स्त्रियोंके पूजनीय होओगे। 'छन्दोदेव' के नामसे तुम्हारी ख्याति होगी और तीनों लोकोंमें तुम्हारी अनुपम कीर्तिका विस्तार होगा ॥ २४½ ॥
एवं तस्मै वरं दत्त्वा वासवोऽन्तरधीयत ॥ २५ ॥ प्राणांस्त्यक्त्वा मतङ्गोऽपि सम्प्राप्तः स्थानमुत्तमम् । इस प्रकार उसे वर देकर इन्द्र वहीं अन्तर्धान हो गये। मतंग भी अपने प्राणोंका परित्याग करके उत्तम स्थान (ब्रह्मलोक)-को प्राप्त हुआ ॥ २५½ ॥