महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 387, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंतात! पूर्वकालमें धर्मपूर्वक प्रजाका पालन करनेवाले महामनस्वी राजा मनुके एक धर्मात्मा पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसका नाम था शर्याति ॥ ६ ॥ तस्यान्ववाये द्वौ राजन् राजानौ सम्बभूवतुः । हैहयस्तालजंघश्च वत्सस्य जयतां वर ॥ ७ ॥ विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ नरेश! राजा शर्यातिके वंशमें दो राजा बड़े विख्यात हुए—हैहय और तालजंघ। ये दोनों ही राजा वत्सके पुत्र थे ॥ ७ ॥ हैहयस्य तु राजेन्द्र दशसु स्त्रीषु भारत । शतं बभूव पुत्राणां शूराणामनिवर्तिनाम् ॥ ८ ॥ भरतवंशी राजेन्द्र! उन दोनोंमें हैहयके (जिसका दूसरा नाम वीतहव्य भी था) दस स्त्रियाँ थीं। उन स्त्रियोंके गर्भसे सौ शूरवीर पुत्र उत्पन्न हुए जो युद्धसे पीछे हटनेवाले नहीं थे ॥ ८ ॥ तुल्यरूपप्रभावाणां बलिनां युद्धशालिनाम् । धनुर्वेदे च वेदे च सर्वत्रैव कृतश्रमाः ॥ ९ ॥ उन सबके रूप और प्रभाव एक समान थे, वे सभी बलवान् तथा युद्धमें शोभा पानेवाले थे। उन्होंने धनुर्वेद और वेदके सभी विषयोंमें परिश्रम किया था ॥ ९ ॥ काशिष्वपि नृपो राजन् दिवोदासपितामहः । हर्यश्व इति विख्यातो बभूव जयतां वरः ॥ १० ॥ उन्हीं दिनों काशी प्रान्तमें हर्यश्व नामके राजा राज्य करते थे, जो दिवोदासके पितामह थे। वे विजयशील वीरोंमें श्रेष्ठ समझे जाते थे ॥ १० ॥ स वीतहव्यदायादैरागत्य पुरुषर्षभ । गङ्गायमुयोर्मध्ये संग्रामे विनिपातितः ॥ ११ ॥ पुरुषप्रवर! वीतहव्यके पुत्रोंने हर्यश्वके राज्यपर चढ़ाई की उन्हें गंगा-यमुनाके बीच युद्धमें मार गिराया ॥ ११ ॥ तं तु हत्वा नरपतिं हैहयास्ते महारथाः । प्रतिजग्मुः पुरीं रम्यां वत्सानामकुतोभयाः ॥ १२ ॥ राजा हर्यश्वको मारकर वे महारथी हैहय-राजकुमार निर्भय हो वत्सवंशी राजाओंकी सुरम्य पुरीको लौट गये ॥ १२ ॥ हर्यश्वस्य च दायादः काशिराजोऽभ्यषिच्यत । सुदेवो देवसंकाशः साक्षाद् धर्म इवापरः ॥ १३ ॥ हर्यश्वके पुत्र सुदेव जो देवताके तुल्य तेजस्वी और साक्षात् दूसरे धर्मराजके समान न्यायशील थे, पिताके बाद काशिराजके पदपर अभिषिक्त किये गये ॥ स पालयामास महीं धर्मात्मा काशिनन्दनः । तैर्वीतहव्यैरागत्य युधि सर्वैर्विनिर्जितः ॥ १४ ॥