भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 394, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 394

यथागतं महाराज मुक्त्वा विषमिवोरगः । भृगुवंशी महर्षे! मैंने इन राजासे अपनी जातिका त्याग करवा दिया।' महाराज! तदनन्तर महर्षिकी आज्ञा लेकर राजा प्रतर्दन जैसे साँप अपने विषको त्याग देता है, उसी प्रकार क्रोध छोड़कर जैसे आया था वैसे लौट गया ।। ५६ १/२ ।। भृगोर्वचनमात्रेण स च ब्रह्मर्षितां गतः ।। ५७ ।। वीतहव्यो महाराज ब्रह्मवादित्वमेव च । नरेश्वर! इस प्रकार राजा वीतहव्य भृगुजीके कथनमात्रसे ब्रह्मर्षि एवं ब्रह्मवादी हो गये ।। ५७ १/२ ।। तस्य गृत्समदः पुत्रो रूपेणेन्द्र इवापरः ।। ५८ ।। शक्रस्त्वमिति यो दैत्यैर्निगृहीतः किलाभवत् । उनके पुत्रो गृत्समद हुए जो रूपमें दूसरे इन्द्रके समान थे। कहते हैं, किसी समय दैत्योंने उन्हें यह कहते हुए पकड़ लिया था कि 'तुम इन्द्र हो' ।। ५८ १/२ ।। ऋग्वेदे वर्तते चाग्र्या श्रुतिर्यस्य महात्मनः ।। ५९ ।। यत्र गृत्समदो राजन् ब्राह्मणैः स महीयते । स ब्रह्मचारी विप्रर्षिः श्रीमान् गृत्समदोऽभवत् ।। ६० ।। ऋग्वेदमें महामना गृत्समदकी श्रेष्ठ श्रुति विद्यमान है। राजन्! वहाँ ब्राह्मणलोग गृत्समदका बड़ा सम्मान करते हैं। ब्रह्मर्षि गृत्समद बड़े तेजस्वी और ब्रह्मचारी थे ।। ५९-६० ।। पुत्रो गृत्समदस्यापि सुचेता अभवद् द्विजः । वर्चाः सुचेतः पुत्रो विहव्यस्तस्य चात्मजः ।। ६१ ।। गृत्समदके पुत्र सुचेता नामके ब्राह्मण हुए। सुचेताके पुत्र वर्चा और वर्चाके पुत्र विहव्य हुए ।। ६१ ।। विहव्यस्य तु पुत्रस्तु वितत्यस्तस्य चात्मजः । वितत्यस्य सुतः सत्यः संतः सत्यस्य चात्मजः ।। ६२ ।। विहव्यके पुत्रका नाम वितत्य था। वितत्यके पुत्र सत्य और सत्यके पुत्र सन्त हुए ।। ६२ ।। श्रवास्तस्य सुतश्चर्षिः श्रवसश्चाभवत् तमः । तमसश्च प्रकाशोऽभूत् तनयो द्विजसत्तमः । प्रकाशस्य च वागिन्द्रो बभूव जयतां वरः ।। ६३ ।। सन्तके पुत्र महर्षि श्रवा, श्रवाके तम और तमके पुत्र द्विजश्रेष्ठ प्रकाश हुए। प्रकाशका पुत्र विजयशीलोंमें श्रेष्ठ वागिन्द्र था ।। ६३ ।। तस्यात्मजश्च प्रमितिर्वेदवेदाङ्गपारगः । घृताच्यां तस्य पुत्रस्तु रुरुर्नामोदपद्यत ।। ६४ ।।