महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 415, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूर्य, चन्द्रमा, वायु, जल, पृथ्वी, आकाश और दिशा—इन सबके अधिष्ठाता देवता सदा ब्राह्मणके शरीरमें प्रवेश करके अन्न भोजन करते हैं ।। ६ १/२ ।। न तस्याश्नन्ति पितरो यस्य विप्रा न भुञ्जते ।। ७ ।। देवाश्चाप्यस्य नाश्नन्ति पापस्य ब्राह्मणद्विषः । ब्राह्मण जिसका अन्न नहीं खाते उसके अन्नको पितर भी नहीं स्वीकार करते। उस ब्राह्मणद्रोही पापात्माका अन्न देवता भी नहीं ग्रहण करते हैं ।। ७ १/२ ।। ब्राह्मणेषु तु तुष्टेषु प्रीयन्ते पितरः सदा ।। ८ ।। तथैव देवता राजन् नात्र कार्या विचारणा । राजन्! यदि ब्राह्मण संतुष्ट हो जायँ तो पितर तथा देवता भी सदा प्रसन्न रहते हैं। इसमें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये ।। ८ १/२ ।। तथैव तेऽपि प्रीयन्ते येषां भवति तद्धविः ।। ९ ।। न च प्रेत्य विनश्यन्ति गच्छन्ति च परां गतिम् । इसी प्रकार वे यजमान भी प्रसन्न होते हैं जिनकी दी हुई हवि ब्राह्मणोंके उपयोगमें आती है। वे मरनेके बाद नष्ट नहीं होते हैं, उत्तम गतिको प्राप्त हो जाते हैं ।। ९ १/२ ।। येन येनैव हविषा ब्राह्मणांस्तर्पयेन्नरः ।। १० ।। तेन तेनैव प्रीयन्ते पितरो देवतास्तथा । मनुष्य जिस-जिस हविष्यसे ब्राह्मणोंको तृप्त करता है, उसी-उसीसे देवता और पितर भी तृप्त होते हैं ।। १० १/२ ।। ब्राह्मणादेव तद् भूतं प्रभवन्ति यतः प्रजाः ।। ११ ।। यतश्चायं प्रभवति प्रेत्य यत्र च गच्छति । वेदैष मार्गं स्वर्गस्य तथैव नरकस्य च ।। १२ ।। आगतानागते चोभे ब्राह्मणो द्विपदं वरः । ब्राह्मणो भरतश्रेष्ठ स्वधर्मं चैव वेद यः ।। १३ ।। जिससे समस्त प्रजा उत्पन्न होती है, वह यज्ञ आदि कर्म ब्राह्मणोंसे ही सम्पन्न होता है। जीव जहाँसे उत्पन्न होता है और मृत्युके पश्चात् जहाँ जाता है, उस तत्त्वको, स्वर्ग और नरकके मार्गको तथा भूत, वर्तमान और भविष्यको ब्राह्मण ही जानता है। ब्राह्मण मनुष्योंमें सबसे श्रेष्ठ है। भरतश्रेष्ठ! जो अपने धर्मको जानता है और उसका पालन करता है, वही सच्चा ब्राह्मण है ।। ११—१३ ।। ये चैनमनुवर्तन्ते ते न यान्ति पराभवम् । न ते प्रेत्य विनश्यन्ति गच्छन्ति न पराभवम् ।। १४ ।। जो लोग ब्राह्मणोंका अनुसरण करते हैं उनकी कभी पराजय नहीं होती तथा मृत्युके पश्चात् उनका पतन नहीं होता। वे अपमानको भी नहीं प्राप्त होते हैं ।। १४ ।।