भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 417, कुल 2566 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 417

ब्राह्मणानेव सेवेत पवित्रं ह्येतदुत्तमम् । ब्राह्मणान् सेवमानस्य रजः सर्वं प्रणश्यति । अतो भूतिरतः कीर्तिरतो बुद्धिः प्रजायते ॥ २२ ॥ **पृथ्वीने कहा—**भगवन्! इसके लिये मनुष्यको ब्राह्मणोंकी ही सेवा करनी चाहिये। यही सबसे पवित्र और उत्तम कार्य है। ब्राह्मणोंकी सेवा करनेवाले पुरुषका समस्त रजोगुण नष्ट हो जाता है। इसीसे ऐश्वर्य, इसीसे कीर्ति और इसीसे उत्तम बुद्धि भी प्राप्त होती है ॥ २२ ॥

महारथश्च राजन्य एष्टव्यः शत्रुतापनः । इति मां नारदः प्राह सततं सर्वभूतये ॥ २३ ॥