भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 419, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 419

सदा सब प्रकारकी समृद्धिके लिये नारदजीने मुझसे कहा कि शत्रुओंको संताप देनेवाले महारथी क्षत्रियके उत्पन्न होनेकी कामना करनी चाहिये ॥ २३ ॥
ब्राह्मणं जातिसम्पन्नं धर्मज्ञं संशितं शुचिम् ।
अपरेषां परेषां च परेभ्यश्चैव येऽपरे ॥ २४ ॥
ब्राह्मणा यं प्रशंसन्ति स मनुष्यः प्रवर्धते ।
अथ यो ब्राह्मणान् क्रुष्टः पराभवति सोऽचिरात् ॥ २५ ॥
उत्तम जातिसे सम्पन्न, धर्मज्ञ, दृढ़तापूर्वक व्रतका पालन करनेवाले तथा पवित्र ब्राह्मणके उत्पन्न होनेकी भी इच्छा रखनी चाहिये। छोटे-बड़े सब लोगोंसे जो बड़े हैं, उनसे भी ब्राह्मण बड़े माने गये हैं। ऐसे ब्राह्मण जिसकी प्रशंसा करते हैं उस मनुष्यकी वृद्धि होती है और जो ब्राह्मणोंकी निन्दा करता है वह शीघ्र ही पराभवको प्राप्त होता है ॥ २४-२५ ॥
यथा महार्णवे क्षिप्त आमलोष्टो विनश्यति ।
तथा दुष्चरितं सर्वं पराभावाय कल्पते ॥ २६ ॥
जैसे महासागरमें फेंका हुआ कच्ची मिट्टीका ढेला तुरंत गल जाता है, उसी प्रकार ब्राह्मणोंका संग प्राप्त होते ही सारा दुष्कर्म नष्ट हो जाता है ॥ २६ ॥
पश्य चन्द्रे कृतं लक्ष्म समुद्रो लवणोदकः ।
तथा भगसहस्रेण महेन्द्रः परिचिह्नितः ॥ २७ ॥
तेषामेव प्रभावेण सहस्रनयनो ह्यसौ ।
शतक्रतुः समभवत् पश्य माधव यादृशम् ॥ २८ ॥
माधव! देखिये, ब्राह्मणोंका कैसा प्रभाव है, उन्होंने चन्द्रमामें कलंक लगा दिया, समुद्रका पानी खारा बना दिया तथा देवराज इन्द्रके शरीरमें एक हजार भगके चिह्न उत्पन्न कर दिये और फिर उन्हींके प्रभावसे वे भग नेत्रके रूपमें परिणत हो गये; जिनके कारण शतक्रतु इन्द्र ‘सहस्राक्ष’ नामसे प्रसिद्ध हुए ॥ २७-२८ ॥
इच्छन् कीर्तिं च भूतिं च लोकांश्च मधुसूदन ।
ब्राह्मणानुमते तिष्ठेत् पुरुषः शुचिरात्मवान् ॥ २९ ॥
मधुसूदन! जो कीर्ति, ऐश्वर्य और उत्तम लोकोंको प्राप्त करना चाहता हो, वह मनको वशमें रखनेवाला पवित्र पुरुष ब्राह्मणोंकी आज्ञाके अधीन रहे ॥ २९ ॥

भीष्म उवाच

इत्येतद् वचनं श्रुत्वा मेदिन्या मधुसूदनः ।
साधु साध्विति कौरव्य मेदिनीं प्रत्यपूजयत् ॥ ३० ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**कुरुनन्दन! पृथ्वीके ये वचन सुनकर भगवान् मधुसूदनने कहा—‘वाह-वाह, तुमने बहुत अच्छी बात बतायी।' ऐसा कहकर उन्होंने भूदेवीकी भूरि-भूरि प्रशंसा की ॥ ३० ॥

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