भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 421, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 421

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पञ्चत्रिंशोऽध्यायः

ब्रह्माजीके द्वारा ब्राह्मणोंकी महत्ताका वर्णन

भीष्म उवाच

जन्मनैव महाभागो ब्राह्मणो नाम जायते ।
नमस्यः सर्वभूतानामतिथिः प्रसृताग्रभुक् ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! ब्राह्मण जन्मसे ही महान् भाग्यशाली, समस्त प्राणियोंका वन्दनीय, अतिथि और प्रथम भोजन पानेका अधिकारी है ॥ १ ॥

सर्वार्थाः सुहृदस्ततात ब्राह्मणाः सुमनोमुखाः ।
गीर्भिर्मङ्गलयुक्ताभिरनुध्यायन्ति पूजिताः ॥ २ ॥
तात! ब्राह्मण सब मनोरथोंको सिद्ध करनेवाले, सबके सुहृद् तथा देवताओंके मुख हैं। वे पूजित होनेपर अपनी मंगलयुक्त वाणीसे आशीर्वाद देकर मनुष्यके कल्याणका चिन्तन करते हैं ॥ २ ॥

सर्वान्न्रो द्विषतस्तात ब्राह्मणा जातमन्यवः ।
गीर्भिर्दारुणयुक्ताभिरभिहन्युरपूजिताः ॥ ३ ॥
तात! हमारे शत्रुओंके द्वारा पूजित न होनेपर उनके प्रति कुपित हुए ब्राह्मण उन सबको अभिशापयुक्त कठोर वाणीद्वारा नष्ट कर डालें ॥ ३ ॥

अत्र गाथाः पुरागीताः कीर्तयन्ति पुराविदः ।
सृष्ट्वा द्विजातीन् धाता हि यथापूर्वं समादधत् ॥ ४ ॥
न चान्यदिह कर्तव्यं किञ्चिदूर्ध्वं यथाविधि ।
गुप्तो गोपायते ब्रह्म श्रेयो वस्तेन शोभनम् ॥ ५ ॥
इस विषयमें पुराणवेत्ता पुरुष पहलेकी गायी हुई कुछ गाथाओंका वर्णन करते हैं—प्रजापतिने ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्योंको पूर्ववत् उत्पन्न करके उनको समझाया, 'तुमलोगोंके लिये विधिपूर्वक स्वधर्मपालन और ब्राह्मणोंकी सेवाके सिवा और कोई कर्तव्य नहीं है। ब्राह्मणकी रक्षा की जाय तो वह स्वयं भी अपने रक्षककी रक्षा करता है; अतः ब्राह्मणकी सेवासे तुमलोगोंका परम कल्याण होगा ॥ ४-५ ॥

स्वमेव कुर्वतां कर्म श्रीर्वो ब्राह्मी भविष्यति ।
प्रमाणं सर्वभूतानां प्रग्रहाश्च भविष्यथ ॥ ६ ॥
'ब्राह्मणकी रक्षारूप अपने कर्तव्यका पालन करनेसे ही तुमलोगोंको ब्राह्मी लक्ष्मी प्राप्त होगी। तुम सम्पूर्ण भूतोंके लिये प्रमाणभूत तथा उनको वशमें करनेवाले बन जाओगे ॥ ६ ॥

न शौद्रं कर्म कर्तव्यं ब्राह्मणेन विपश्चिता ।