महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 423, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंभूयस्तेषां बलं मन्ये यथा राज्ञस्तपस्विनः । दुरासदाश्च चण्डाश्च रभसाः क्षिप्रकारिणः ॥ १३ ॥ मैं ब्राह्मणोंका बल तपस्वी राजाके समान बहुत बड़ा मानता हूँ। वे दुर्जय, प्रचण्ड, वेगशाली और शीघ्रकारी होते हैं ॥ १३ ॥
सन्त्येषां सिंहसत्त्वाश्च व्याघ्रसत्त्वास्तथापरे । वराहमृगसत्त्वाश्च जलसत्त्वास्तथापरे ॥ १४ ॥ ब्राह्मणोंमें कुछ सिंहके समान शक्तिशाली होते हैं और कुछ व्याघ्रके समान। कितनोंकी शक्ति वाराह और मृगके समान होती है। कितने ही जल-जन्तुओंके समान होते हैं ॥ १४ ॥
सर्पस्पर्शसमाः केचित् तथान्ये मकरस्पृशः । विभाष्यघातिनः केचित् तथा चक्षुर्हणोऽपरे ॥ १५ ॥ किन्हींका स्पर्श सर्पके समान होता है तो किन्हींका घड़ियालोंके समान। कोई शाप देकर मारते हैं तो कोई क्रोधभरी दृष्टिसे देखकर ही भस्म कर देते हैं ॥ १५ ॥
सन्ति चाशीविषसमाः सन्ति मन्दास्तथापरे । विविधानीह वृत्तानि ब्राह्मणानां युधिष्ठिर ॥ १६ ॥ कुछ ब्राह्मण विषधर सर्पके समान भयंकर होते हैं और कुछ मन्द स्वभावके भी होते हैं। युधिष्ठिर! इस जगत्में ब्राह्मणोंके स्वभाव और आचार-व्यवहार अनेक प्रकारके हैं ॥ १६ ॥
मेकला द्राविडा लाटाः पौण्ड्राः कान्वशिरास्तथा । शौण्डिका दरदा दार्वाश्चौराः शबरबर्बराः ॥ १७ ॥ किराता यवनाश्चैव तास्ताः क्षत्रियजातयः । वृषलत्वमनुप्राप्ता ब्राह्मणानाममर्षणात् ॥ १८ ॥ मेकल, द्राविड़, लाट, पौण्ड्र, कान्वशिरा, शौण्डिक, दरद, दार्व, चौर, शबर, बर्बर, किरात और यवन—ये सब पहले क्षत्रिय थे; किंतु ब्राह्मणोंके साथ ईर्ष्या करनेसे नीच हो गये ॥ १७-१८ ॥
ब्राह्मणानां परिभवादसुराः सलिलेशयाः । ब्राह्मणानां प्रसादाच्च देवाः स्वर्गनिवासिनः ॥ १९ ॥ ब्राह्मणोंके तिरस्कारसे ही असुरोंको समुद्रमें रहना पड़ा और ब्राह्मणोंके कृपाप्रसादसे देवता स्वर्गलोकमें निवास करते हैं ॥ १९ ॥
अशक्यं स्प्रष्टुमाकाशमचाल्यो हिमवान् गिरिः । अधार्या सेतुना गङ्गा दुर्जया ब्राह्मणा भुवि ॥ २० ॥ जैसे आकाशको छूना, हिमालयको विचलित करना और बाँध बाँधकर गङ्गाके प्रवाहको रोक देना असम्भव है, उसी प्रकार इस भूतलपर ब्राह्मणोंको जीतना सर्वथा असम्भव है ॥ २० ॥