महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 463, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंअन्यथाऽऽलिङ्ग्यते कान्ता स्नेहेन दुहितान्यथा ।। जो मानसिक दोषसे रहित हैं उन्हें पाप नहीं लगता। यही बात तुम्हारे लिये भी हुई है। अपनी प्राणवल्लभा पत्नीका आलिंगन और भावसे किया जाता है और अपनी पुत्रीका और भावसे; अर्थात् उसे वात्सल्यस्नेहसे गले लगाया जाता है ।। निष्कषायो विशुद्धस्त्वं रुच्यावेशान्न दूषितः ।) तुम्हारे मनमें राग नहीं है। तुम सर्वथा विशुद्ध हो, इसलिये रुचिके शरीरमें प्रवेश करके भी दूषित नहीं हुए हो ।। यदि त्वहं त्वां दुर्वृत्तमद्राक्षं द्विजसत्तम । शपेयं त्वामहं क्रोधान्न मेऽत्रास्ति विचारणा ।। १४ ।। द्विजश्रेष्ठ! यदि मैं इस कर्ममें तुम्हारा दुराचार देखता तो कुपित होकर तुम्हें शाप दे देता और ऐसा करके मेरे मनमें कोई अन्यथा विचार या पश्चात्ताप नहीं होता ।। १४ ।। सज्जन्ति पुरुषे नार्यः पुंसां सोऽर्थश्च पुष्कलः । अन्यथारक्षतः शापोऽभविष्यत् ते मतिश्च मे ।। १५ ।। स्त्रियाँ पुरुषमें आसक्त होती हैं और पुरुषोंका भी इसमें पूर्णतः वैसा ही भाव होता है। यदि तुम्हारा भाव उसकी रक्षा करनेके विपरीत होता तो तुम्हें शाप अवश्य प्राप्त होता और मेरा विचार तुम्हें शाप देनेका अवश्य हो जाता ।। १५ ।। रक्षिता च त्वया पुत्र मम चापि निवेदिता । अहं ते प्रीतिमांस्तात स्वस्थः स्वर्गं गमिष्यसि ।। १६ ।। बेटा! तुमने यथाशक्ति मेरी स्त्रीकी रक्षा की है और यह बात मुझे बतायी है, अतः मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। तात! तुम स्वस्थ रहकर स्वर्गलोकमें जाओगे ।। इत्युक्त्वा विपुलं प्रीतो देवशर्मा महार्नृषिः । मुमोद स्वर्गमास्थाय सहभार्यः सशिष्यकः ।। १७ ।। विपुलसे ऐसा कहकर प्रसन्न हुए महर्षि देवशर्मा अपनी पत्नी और शिष्यके साथ स्वर्गमें जाकर वहाँका सुख भोगने लगे ।। १७ ।। इदमाख्यातवांश्चापि ममाख्यानं महामुनिः । मार्कण्डेयः पुरा राजन् गङ्गाकूले कथान्तरे ।। १८ ।। राजन्! पूर्वकालमें गंगाके तटपर कथा-वार्ताके बीचमें ही महामुनि मार्कण्डेयने मुझे यह आख्यान सुनाया था ।। १८ ।। तस्माद् ब्रवीमि पार्थ त्वां स्त्रियो रक्ष्याः सदैव च । उभयं दृश्यते तासु सततं साध्वसाधु च ।। १९ ।। अतः कुन्तीनन्दन! मैं तुमसे कहता हूँ कि तुम्हें स्त्रियोंकी सदा ही रक्षा करनी चाहिये। स्त्रियोंमें भली और बुरी दोनों बातें हमेशा देखी जाती हैं ।। १९ ।। स्त्रियः साध्यो महाभागाः सम्मता लोकमातरः ।