महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरतिके लिये शूद्र-जातिकी कन्यासे भी विवाह किया जा सकता है; परंतु और लोग ऐसा नहीं मानते (वे शूद्र-कन्याको त्रैवर्णिकोंके लिये अग्राह्य बतलाते हैं) ।। १२ ।। अपत्यजन्म शूद्रायां न प्रशंसन्ति साधवः । शूद्रायां जनयन् विप्रः प्रायश्चित्ती विधीयते ।। १३ ।। श्रेष्ठ पुरुष ब्राह्मणका शूद्र-कन्याके गर्भसे संतान उत्पन्न करना अच्छा नहीं मानते। शूद्राके गर्भसे संतान उत्पन्न करनेवाला ब्राह्मण प्रायश्चित्तका भागी होता है ।। त्रिंशद्वर्षो दशवर्षां भार्यां विन्देत नग्निकाम् । एकविंशतिवर्षो वा सप्तवर्षामवाप्नुयात् ।। १४ ।। तीस वर्षका पुरुष दस वर्षकी कन्याको, जो रजस्वला न हुई हो, पत्नीरूपमें प्राप्त करे। अथवा इक्कीस वर्षका पुरुष सात वर्षकी कुमारीके साथ विवाह करे ।। १४ ।। यस्यास्तु न भवेद् भ्राता पिता वा भरतर्षभ । नोपयच्छेत तां जातु पुत्रिकाधर्मिणी हि सा ।। १५ ।। भरतश्रेष्ठ! जिस कन्याके पिता अथवा भाई न हों, उसके साथ कभी विवाह नहीं करना चाहिये; क्योंकि वह पुत्रिका-धर्मवाली मानी जाती है ।। १५ ।। त्रीणि वर्षाण्युदीक्षेत कन्या ऋतुमती सती । चतुर्थे त्वथ सम्प्राप्ते स्वयं भर्तारमर्जयेत् ।। १६ ।। (यदि पिता, भ्राता आदि अभिभावक ऋतुमती होनेके पहले कन्याका विवाह न कर दें तो) ऋतुमती होनेके पश्चात् तीन वर्षतक कन्या अपने विवाहकी बाट देखे। चौथा वर्ष लगनेपर वह स्वयं ही किसीको अपना पति बना ले ।। १६ ।। प्रजा न हीयते तस्या रतिश्च भरतर्षभ । अतोऽन्यथा वर्तमाना भवेद् वाच्या प्रजापतेः ।। १७ ।। भरतश्रेष्ठ! ऐसा करनेपर उस कन्याका उस पुरुषके साथ किया हुआ सम्बन्ध तथा उससे होनेवाली संतान निम्न श्रेणीकी नहीं समझी जाती। इसके विपरीत बर्ताव करनेवाली स्त्री प्रजापतिकी दृष्टिमें निन्दनीय होती है ।। १७ ।। असपिण्डा च या मातुरसगोत्रा च या पितुः । इत्येतामनुगच्छेत तं धर्मं मनुरब्रवीत् ।। १८ ।। जो कन्या माताकी सपिण्ड और पिताके गोत्रकी न हो, उसीका अनुगमन करे। इसे मनुजीने धर्मानुकूल बताया है³ ।। १८ ।।
युधिष्ठिर उवाच
शुल्कमन्येन दत्तं स्याद् ददानीत्याह चापरः । बलादन्यः प्रभाषेत धनमन्यः प्रदर्शयेत् ।। १९ ।। पाणिगृहीता चान्यः स्यात् कस्य भार्या पितामह ।