महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 47, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंनान्यमात्मप्रदानात् स तस्या वव्रे वरं द्विजः ॥ ५५ ॥ राजकन्याने दूसरी कोई अभीष्ट वस्तु माँगनेके लिये उस अतिथिसे बारंबार अनुरोध किया, किंतु उस ब्राह्मणने उसके शरीर-दानके सिवा और कोई अभिलषित पदार्थ उससे नहीं माँगा ॥ ५५ ॥
सा तु राजसुता स्मृत्वा भर्तुर्वचनमादितः । तथेति लज्जमाना सा तमुवाच द्विजर्षभम् ॥ ५६ ॥ तब राजकुमारीने पहले कहे हुए पतिके वचनको याद करके लजाते-लजाते उस द्विजश्रेष्ठसे कहा—‘अच्छा, आपकी आज्ञा स्वीकार है’ ॥ ५६ ॥
ततो विहस्य विप्रर्षिः सा चैवाथ विवेश ह । संस्मृत्य भर्तुर्वचनं गृहस्थाश्रमकाङ्क्षिणः ॥ ५७ ॥ गृहस्थाश्रम-धर्मके पालनकी इच्छा रखनेवाले पतिकी कही हुई बातको स्मरण करके जब उसने ब्राह्मणके समक्ष ‘हाँ’ कर दिया, तब उस विप्र ऋषिने मुसकराकर ओघवतीके साथ घरके भीतर प्रवेश किया ॥ ५७ ॥
अथेध्यानमुपादाय स पावकिरुपागमत् । मृत्युना रौद्रभावेन नित्यं बन्धुरिवान्वितः ॥ ५८ ॥ इतनेहीमें अग्निकुमार सुदर्शन समिधा लेकर लौट आये। मृत्यु क्रूर भावनासे सदा उनके पीछे लगी रहती थी, मानो कोई स्नेही बन्धु अपने प्रिय बन्धुके पीछे-पीछे चल रहा हो ॥ ५८ ॥
ततस्त्वाश्रममागम्य स पावकसुतस्तदा । तां व्याजहारौघवतीं क्वासि यातेति चासकृत् ॥ ५९ ॥ आश्रमपर पहुँचकर फिर अग्निपुत्र सुदर्शन अपनी पत्नी ओघवतीको बारंबार पुकारने लगे—‘देवि! तुम कहाँ चली गयी?’ ॥ ५९ ॥
तस्मै प्रतिवचः सा तु भर्त्रे न प्रददौ तदा । कराभ्यां तेन विप्रेण स्पृष्टा भर्तृव्रता सती ॥ ६० ॥ उच्छिष्टास्मीति मन्वाना लज्जिता भर्तुरिव च । तूष्णीं भूताभवत् साध्वी न चोवाचाथ किंचन ॥ ६१ ॥ परंतु ओघवतीने उस समय अपने पतिको कोई उत्तर नहीं दिया। अतिथिरूपमें आये हुए ब्राह्मणने अपने दोनों हाथोंसे उसे छू दिया था। इससे वह सती-साध्वी पतिव्रता अपनेको दूषित मानकर अपने स्वामीसे भी लज्जित हो गयी थी; इसीलिये वह साध्वी चुप हो गयी। कुछ भी बोल न सकी ॥ ६०-६१ ॥
अथ तां पुनरेवेदं प्रोवाच स सुदर्शनः । क्व सा साध्वी क्व सा याता गरीयः किमतो मम ॥ ६२ ॥ पतिव्रता सत्यशीला नित्यं चैवार्जवे रता ।