महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें'जिस गृहस्थके घरपर आया हुआ अतिथि पूजित होकर जाता है उसके लिये उससे बढ़कर दूसरा कोई धर्म नहीं है—ऐसा मनीषी पुरुष कहते हैं ।। ७० ।।
प्राणा हि मम दाराश्च यच्चान्यद् विद्यते वसु । अतिथिभ्यो मया देयमिति मे व्रतमाहितम् ।। ७१ ।। 'मेरे प्राण, मेरी पत्नी तथा मेरे पास और जो कुछ धन-दौलत हैं, वह सब मेरी ओरसे अतिथियोंके लिये निछावर है, ऐसा मैंने व्रत ले रखा है ।। ७१ ।।
निःसंदिग्धं यथा वाक्यमेतन्मे समुदाहृतम् । तेनाहं विप्र सत्येन स्वयमात्मानमालभे ।। ७२ ।। 'ब्रह्मन्! मैंने जो यह बात कही है, इसमें संदेह नहीं है। इस सत्यको सिद्ध करनेके लिये मैं स्वयं ही अपने शरीरको छूकर शपथ खाता हूँ ।। ७२ ।।
पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिश्च पञ्चमम् । बुद्धिरात्मा मनः कालो दिशश्चैव गुणा दश ।। ७३ ।। नित्यमेव हि पश्यन्ति देहिनां देहसंश्रिताः । सुकृतं दुष्कृतं चापि कर्म धर्मभृतां वर ।। ७४ ।। 'धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ ब्राह्मण! पृथ्वी, वायु, आकाश, जल, नेत्र, बुद्धि, आत्मा, मन, काल और दिशाएँ—से दस गुण (वस्तुएँ) सदा ही प्राणियोंके शरीरमें स्थित होकर उनके पुण्य और पापकर्मको देखा करते हैं ।। ७३-७४ ।।
यथैषा नानृता वाणी मयाद्य समुदीरिता । तेन सत्येन मां देवाः पालयन्तु दहन्तु वा ।। ७५ ।। 'आज मेरी कही हुई यह वाणी यदि मिथ्या नहीं है तो इस सत्यके प्रभावसे देवता मेरी रक्षा करें, अथवा मिथ्या होनेपर मुझे जलाकर भस्म कर डालें' ।। ७५ ।।
ततो नादः समभवद् दिक्षु सर्वासु भारत । असकृत् सत्यमित्येवं नैतन्मिथ्येति सर्वतः ।। ७६ ।। भरतनन्दन! सुदर्शनके इतना कहते ही सम्पूर्ण दिशाओंसे बारंबार आवाज आने लगी—'तुम्हारा कथन सत्य है। इसमें झूठका लेश भी नहीं है' ।। ७६ ।।
उटजात् तु ततस्तस्मान्निष्क्राम स वै द्विजः । वपुषा द्यां च भूमिं च व्याप्य वायुरिवोद्यतः ।। ७७ ।। तत्पश्चात् वह ब्राह्मण उस आश्रमसे बाहर निकला। वह अपने शरीरसे वायुकी भाँति पृथ्वी और आकाशको व्याप्त करके स्थित हो गया ।। ७७ ।।
स्वरेण विप्रः शैक्षेण त्रीँल्लोकाननुनादयन् । उवाच चैनं धर्मज्ञं पूर्वमामन्त्र्य नामतः ।। ७८ ।। शिक्षाके अनुकूल उदात्त आदि स्वरसे तीनों लोकोंको प्रतिध्वनित करते हुए उस ब्राह्मणने पहले धर्मज्ञ सुदर्शनको सम्बोधित करके उससे इस प्रकार कहा— ।। ७८ ।।