महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसर्वानुपायानथ सम्प्रधार्य समुद्धरेत् स्वस्य कुलस्य तन्त्रम् । ज्येष्ठो यवीयानपि यो द्विजस्य शुश्रूषया दानपरायणः स्यात् ।। ६ ।। शूद्रापुत्र सभी उपायोंका विचार करके अपनी कुल-परम्पराका उद्धार करे। वह अवस्थामें ज्येष्ठ होनेपर भी ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यकी अपेक्षा छोटा ही समझा जाता है, अतः उसे त्रैवर्णिकोंकी सेवा करते हुए दानपरायण होना चाहिये ।। ६ ।।
तिस्रः क्षत्रियसम्बन्धाद् द्वयोरात्मास्य जायते । हीनवर्णास्तृतीयायां शूद्रा उग्रा इति स्मृतिः ।। ७ ।। क्षत्रियकी क्षत्रिया, वैश्या और शूद्रा—ये तीन भार्याएँ होती हैं। इनमेंसे क्षत्रिया और वैश्याके गर्भसे क्षत्रियके सम्पर्कसे जो पुत्र उत्पन्न होता है, वह क्षत्रिय ही होता है। तीसरी शूद्राके गर्भसे हीन वर्णवाले शूद्र ही उत्पन्न होते हैं; जिनकी उग्र संज्ञा है। ऐसा धर्मशास्त्रका कथन है ।। ७ ।।
द्वे चापि भार्ये वैश्यस्य द्वयोरात्मास्य जायते । शूद्रा शूद्रस्य चाप्येका शूद्रमेव प्रजायते ।। ८ ।। वैश्यकी दो भार्याएँ होती हैं—वैश्या और शूद्रा। उन दोनोंके गर्भसे जो पुत्र उत्पन्न होता है, वह वैश्य ही होता है। शूद्रकी एक ही भार्या होती है शूद्रा, जो शूद्रको ही जन्म देती है ।। ८ ।।
अतोऽविशिष्टस्त्वधमो गुरुदारप्रधर्षकः । बाह्यं वर्णं जनयति चातुर्वर्ण्यविगर्हितम् ।। ९ ।। अतः वर्णोंमें नीचे दर्जेका शूद्र यदि गुरुजनों—ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्योंकी स्त्रियोंके साथ समागम करता है तो वह चारों वर्णोंद्वारा निन्दित वर्णबहिष्कृत (चाण्डाल आदि) को जन्म देता है ।। ९ ।।
विप्रायां क्षत्रियो बाह्यं सूतं स्तोमक्रियापरम् । वैश्यो वैदेहकं चापि मौद्गल्यमपवर्जितम् ।। १० ।। क्षत्रिय ब्राह्मणीके साथ समागम करनेपर उसके गर्भसे 'सूत' जातिका पुत्र उत्पन्न करता है, जो वर्णबहिष्कृत और स्तुति-कर्म करनेवाला (एवं रथीका काम करनेवाला) होता है। उसी प्रकार वैश्य यदि ब्राह्मणीके साथ समागम करे तो वह संस्कारभ्रष्ट 'वैदेहक' जातिवाले पुत्रको उत्पन्न करता है, जिससे अन्तःपुरकी रक्षा आदिका काम लिया जाता है और इसलिये जिसको 'मौद्गल्य' भी कहते हैं ।। १० ।।
शूद्रश्चाण्डालमत्युग्रं वध्यघ्नं बाह्यवासिनम् । ब्राह्मण्यां सम्प्रजायन्त इत्येते कुलपांसनाः । एते मतिमतां श्रेष्ठ वर्णसंकरजाः प्रभो ।। ११ ।।