महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 52, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंइस प्रकार सुदर्शनने अतिथि-सत्कारके पुण्यसे मृत्यु, आत्मा, लोक, पञ्चभूत, बुद्धि, काल, मन, आकाश, काम और क्रोधको भी जीत लिया ॥ ९० ॥
तस्माद् गृहाश्रमस्थस्य नान्यद् दैवतमस्ति वै ।
ऋतेऽतिथिं नरव्याघ्र मनसैतद् विचारय ॥ ९१ ॥
पुरुषसिंह! इसलिये तुम अपने मनमें यह निश्चित विचार कर लो कि गृहस्थ पुरुषके लिये अतिथिको छोड़कर दूसरा कोई देवता नहीं है ॥ ९१ ॥
अतिथिः पूजितो यद्धि ध्यायते मनसा शुभम् ।
न तत् क्रतुशतेनापि तुल्यमाहुर्मनीषिणः ॥ ९२ ॥
यदि अतिथि पूजित होकर मन-ही-मन गृहस्थके कल्याणका चिन्तन करे तो उससे जो फल मिलता है उसकी सौ यज्ञोंसे भी तुलना नहीं हो सकती अर्थात् सौ यज्ञोंसे भी बढ़कर है। ऐसा मनीषी पुरुषों का कथन है ॥ ९२ ॥
पात्रं त्वतिथिमासाद्य शीलाढ्यं यो न पूजयेत् ।
स दत्त्वा दुष्कृतं तस्मै पुण्यमादाय गच्छति ॥ ९३ ॥
जो गृहस्थ सुपात्र और सुशील अतिथिको पाकर उसका यथोचित सत्कार नहीं करता, वह अतिथि उसे अपना पाप दे उसका पुण्य लेकर चला जाता है ॥ ९३ ॥
एतत् ते कथितं पुत्र मयाऽऽख्यानमनुत्तमम् ।
यथा हि विजितो मृत्युर्गृहस्थेन पुराभवत् ॥ ९४ ॥
बेटा! तुम्हारे प्रश्नके अनुसार पूर्वकालमें गृहस्थने जिस प्रकार मृत्युपर विजय पायी थी, वह उत्तम उपाख्यान मैंने तुमसे कहा ॥ ९४ ॥
धन्यं यशस्यमायुष्यमिदमाख्यानमुत्तमम् ।
बुभूषताभिमन्तव्यं सर्वदुश्चरितापहम् ॥ ९५ ॥
यह उत्तम आख्यान धन, यश और आयुकी प्राप्ति करानेवाला है। इससे सब प्रकारके दुष्कर्मोंका नाश हो जाता है, अतः अपनी उन्नति चाहनेवाले पुरुषको सदा ही इसके प्रति आदरबुद्धि रखनी चाहिये ॥ ९५ ॥
इदं यः कथयेद् विद्वानहन्यहनि भारत ।
सुदर्शनस्य चरितं पुण्याँल्लोकानवाप्नुयात् ॥ ९६ ॥
भरतनन्दन! जो विद्वान् सुदर्शनके इस चरित्रका प्रतिदिन वर्णन करता है वह पुण्यलोकोंको प्राप्त होता है* ॥ ९६ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि सुदर्शनोपाख्याने द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें सुदर्शनका उपाख्यानविषयक दूसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ २ ॥