महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 535, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्रिया परमया युक्तां यथा दृष्टा पुरा मया ॥ ६२ ॥ 'मैं अपनी इन महारानीको परम उत्तम कान्तिसे युक्त तथा अप्सराके समान मनोहर देख रहा हूँ। ये पहले मुझे जैसी दिखायी देती थीं वैसी ही हो गयी हैं' ॥ ६२ ॥ तव प्रसादसंवृत्तमिदं सर्वं महामुने । नैतच्चित्रं तु भगवंस्त्वयि सत्यपराक्रम ॥ ६३ ॥ 'महामुने! यह सब आपके कृपाप्रसादसे सम्भव हुआ है। भगवन्! आप सत्यपराक्रमी हैं। आप-जैसे तपस्वियोंमें ऐसी शक्तिका होना आश्चर्यकी बात नहीं है' ॥ ६३ ॥ इत्युक्तः प्रत्युवाचैनं कुशिकं च्यवनस्तदा । आगच्छेथाः सभार्यश्च त्वमिहेति नराधिप ॥ ६४ ॥ उनके ऐसा कहनेपर मुनिवर च्यवन पुनः राजा कुशिकसे बोले—'नरेश्वर! तुम पुनः अपनी पत्नीके साथ कल यहाँ आना' ॥ ६४ ॥ इत्युक्तः समनुज्ञातो राजर्षिरभिवाद्य तम् । प्रययौ वपुषा युक्तो नगरं देवराजवत् ॥ ६५ ॥ महर्षिकी यह आज्ञा पाकर राजर्षि कुशिक उन्हें प्रणाम करके विदा ले देवराजके समान तेजस्वी शरीरसे युक्त हो अपने नगरकी ओर चल दिये ॥ ६५ ॥ तत एनमुपाजग्मुरमात्याः सपुरोहिताः । बलस्था गणिकायुक्ताः सर्वाः प्रकृतयस्तथा ॥ ६६ ॥ तदनन्तर उनके पीछे-पीछे मन्त्री, पुरोहित, सेनापति, नर्तकियाँ तथा समस्त प्रजावर्गके लोग चले ॥ ६६ ॥ तैर्वृतः कुशिको राजा श्रिया परमया ज्वलन् । प्रविवेश पुरं हृष्टः पूज्यमानोऽथ बन्दिभिः ॥ ६७ ॥ उनसे घिरे हुए राजा कुशिक उत्कृष्ट तेजसे प्रकाशित हो रहे थे। उन्होंने बड़े हर्षके साथ नगरमें प्रवेश किया। उस समय वन्दीजन उनके गुण गा रहे थे ॥ ६७ ॥ ततः प्रविश्य नगरं कृत्वा पौर्वाह्निकीः क्रियाः । भुक्त्वा सभार्यो रजनीमुवास स महाद्युतिः ॥ ६८ ॥ नगरमें प्रवेश करके उन्होंने पूर्वाह्नकालकी सम्पूर्ण क्रियाएँ सम्पन्न कीं। फिर पत्नीसहित भोजन करके उन महातेजस्वी नरेशने रातको महलमें निवास किया ॥ ६८ ॥ ततस्तु तौ नवमभिवीक्ष्य यौवनं परस्परं विगतरुजाविवामरौ । ननन्दतुः शयनगतौ वपुर्धरौ श्रिया युतौ द्विजवरदत्तया तदा ॥ ६९ ॥ वे दोनों पति-पत्नी नीरोग देवताओंके समान दिखायी देते थे। वे एक दूसरेके शरीरमें नयी जवानीका प्रवेश हुआ देखकर शय्यापर सोये-सोये बड़े आनन्दका अनुभव करने लगे।