महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 546, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंन च ते दुष्कृतं किंचिदहमासाद्यं गृहे । तेन जीवसि राजर्षे न भवेथास्त्वमन्यथा ॥ १५ ॥ भूपाल! इसी उद्देश्यसे तुम्हारे नगरमें आकर मैंने तुमसे कहा कि मैं एक व्रतका आरम्भ करूँगा। तुम मेरी सेवा करो (इसी अभिप्रायसे मैं तुम्हारा दोष ढूँढ़ रहा था); किंतु तुम्हारे घरमें रहकर भी मैंने आजतक तुममें कोई दोष नहीं पाया। राजर्षे! इसीलिये तुम जीवित हो, अन्यथा तुम्हारी सत्ता मिट गयी होती ॥ १४-१५ ॥ एवं बुद्धिं समास्थाय दिवसानेकविंशतिम् । सुप्तोऽस्मि यदि मां कश्चिद् बोधयेदिति पार्थिव ॥ १६ ॥ भूपते! यही विचार मनमें लेकर मैं इक्कीस दिनोंतक एक करवटसे सोता रहा कि कोई मुझे बीचमें आकर जगावे ॥ १६ ॥ यदा त्वया सभार्येण संसुप्तो न प्रबोधितः । अहं तदैव ते प्रीतो मनसा राजसत्तम ॥ १७ ॥ नृपश्रेष्ठ! जब पत्नीसहित तुमने मुझे सोते समय नहीं जगाया, तभी मैं तुम्हारे ऊपर मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुआ था ॥ १७ ॥ उत्थाय चास्मि निष्क्रान्तो यदि मां त्वं महीपते । पृच्छेः क्व यास्यसीत्येवं शपेयं त्वामिति प्रभो ॥ १८ ॥ भूपते! प्रभो! जिस समय मैं उठकर घरसे बाहर जाने लगा उस समय यदि तुम मुझसे पूछ देते कि 'कहाँ जाइयेगा' तो इतनेसे ही मैं तुम्हें शाप दे देता ॥ १८ ॥ अन्तर्हितः पुनश्चास्मि पुनरेव च ते गृहे । योगमास्थाय संसुप्तो दिवसानेकविंशतिम् ॥ १९ ॥ फिर मैं अन्तर्धान हुआ और पुनः तुम्हारे घरमें आकर योगका आश्रय ले इक्कीस दिनोंतक सोया ॥ क्षुधितौ मामसूयेथां श्रमाद् वेति नराधिप । एवं बुद्धिं समास्थाय कर्शितौ वां क्षुधा मया ॥ २० ॥ नरेश्वर! मैंने सोचा था कि तुम दोनों भूखसे पीड़ित होकर या परिश्रमसे थककर मेरी निन्दा करोगे। इसी उद्देश्यसे मैंने तुमलोगोंको भूखे रखकर क्लेश पहुँचाया ॥ २० ॥ न च तेऽभूत् सुसूक्ष्मोऽपि मन्युर्मनसि पार्थिव । सभार्यस्य नरश्रेष्ठ तेन ते प्रीतिमानहम् ॥ २१ ॥ भूपते! नरश्रेष्ठ! इतनेपर भी स्त्रीसहित तुम्हारे मनमें तनिक भी क्रोध नहीं हुआ। इससे मैं तुमलोगोंपर बहुत संतुष्ट हुआ ॥ २१ ॥ भोजनं च समानाय्य यत् तदा दीपितं मया । क्रुद्ध्येथा यदि मात्सर्यादिति तन्मर्षितं च मे ॥ २२ ॥