भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 548, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 548

तात! तप और ब्राह्मणत्वके सम्बन्धमें तुम जैसा उद्गार प्रकट कर रहे थे, वह बिलकुल ठीक है। वास्तवमें ब्राह्मणत्व दुर्लभ है। ब्राह्मण होनेपर भी ऋषि होना और ऋषि होनेपर भी तपस्वी होना तो और भी कठिन है ॥ ३० ॥
भविष्यत्येष ते कामः कुशिकात् कौशिको द्विजः ।
तृतीयं पुरुषं तुभ्यं ब्राह्मणत्वं गमिष्यति ॥ ३१ ॥
तुम्हारी यह इच्छा पूर्ण होगी। कुशिकसे कौशिक नामक ब्राह्मणवंश प्रचलित होगा तथा तुम्हारी तीसरी पीढ़ी ब्राह्मण हो जायगी ॥ ३१ ॥
वंशस्ते पार्थिवश्रेष्ठ भृगूणामेव तेजसा ।
पौत्रस्ते भविता विप्रस्तपस्वी पावकद्युतिः ॥ ३२ ॥
नृपश्रेष्ठ! भृगुवंशियोंके ही तेजसे तुम्हारा वंश ब्राह्मणत्वको प्राप्त होगा। तुम्हारा पौत्र अग्निके समान तेजस्वी और तपस्वी ब्राह्मण होगा ॥ ३२ ॥
यः स देवमनुष्याणां भयमुत्पादयिष्यति ।
त्रयाणामेव लोकानां सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ ३३ ॥
तुम्हारा वह पौत्र अपने तपके प्रभावसे देवताओं, मनुष्यों तथा तीनों लोकोंके लिये भय उत्पन्न कर देगा। मैं तुमसे यह सच्ची बात कहता हूँ ॥ ३३ ॥
वरं गृहाण राजर्षे यत् ते मनसि वर्तते ।
तीर्थयात्रां गमिष्यामि पुरा कालोऽभिवर्तते ॥ ३४ ॥
राजर्षे! तुम्हारे मनमें जो इच्छा हो, उसे वरके रूपमें माँग लो। मैं तीर्थयात्राको जाऊँगा। अब देर हो रही है ॥ ३४ ॥

कुशिक उवाच
एष एव वरो मेऽद्य यस्त्वं प्रीतो महामुने ।
भवत्वेतद् यथाऽऽत्थ त्वं भवेत् पौत्रो ममानघ ॥ ३५ ॥
कुशिकने कहा— महामुने! आज आप प्रसन्न हैं, यही मेरे लिये बहुत बड़ा वर है। अनघ! आप जैसा कह रहे हैं, वह सत्य हो—मेरा पौत्र ब्राह्मण हो जाय ॥ ३५ ॥
ब्राह्मण्यं मे कुलस्यास्तु भगवन्नेष मे वरः ।
पुनश्चाख्यातुमिच्छामि भगवन् विस्तरेण वै ॥ ३६ ॥
भगवन्! मेरा कुल ब्राह्मण हो जाय, यही मेरा अभीष्ट वर है। प्रभो! मैं इस विषयको पुनः विस्तारके साथ सुनना चाहता हूँ ॥ ३६ ॥
कथमेष्यति विप्रत्वं कुलं मे भृगुनन्दन ।
कश्चासौ भविता बन्धुर्मम कश्चापि सम्मतः ॥ ३७ ॥
भृगुनन्दन! मेरा कुल किस प्रकार ब्राह्मणत्वको प्राप्त होगा? मेरा वह बन्धु, वह सम्मानित पौत्र कौन होगा जो सर्वप्रथम ब्राह्मण होनेवाला है? ॥ ३७ ॥