भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 559, कुल 2566 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 559

पुण्याभिरामं बहुरत्नपूर्णं लभत्यधिष्ठानवरं स राजन् ॥ ३९ ॥ 'राजन्! जो पुरुष ब्राह्मणको अन्न और शय्यासे सम्पन्न गृह दान करता है, उसे अत्यन्त पवित्र, मनोहर और नाना प्रकारके रत्नोंसे भरा हुआ उत्तम घर प्राप्त होता है ॥

सुगन्धचित्रास्तरणोपधानं दद्यान्नरो यः शयनं द्विजाय । रूपान्वितां पक्षवतीं मनोज्ञां भार्यामयत्नोपगतां लभेत् सः ॥ ४० ॥ 'जो मनुष्य ब्राह्मणको सुगन्धयुक्त विचित्र बिछौने और तकियेसे युक्त शय्याका दान करता है, वह बिना यत्नके ही उत्तम कुलमें उत्पन्न अथवा सुन्दर केशपाशवाली, रूपवती एवं मनोहारिणी भार्या प्राप्त कर लेता है ॥ ४० ॥

पितामहस्यानवरो वीरशायी भवेन्नरः । नाधिकं विद्यते यस्मादित्याहुः परमर्षयः ॥ ४१ ॥ 'संग्रामभूमिमें वीरशय्यापर शयन करनेवाला पुरुष ब्रह्माजीके समान हो जाता है। ब्रह्माजीसे बढ़कर कुछ भी नहीं है—ऐसा महर्षियोंका कथन है' ॥ ४१ ॥

वैशम्पायन उवाच

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा प्रीतात्मा कुरुनन्दनः । नाश्रमेऽरोचयद् वासं वीरमार्गाभिकाङ्क्षया ॥ ४२ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! पितामहका यह वचन सुनकर युधिष्ठिरका मन प्रसन्न हो उठा। एवं वीरमार्गकी अभिलाषा उत्पन्न हो जानेके कारण उन्होंने आश्रममें निवास करनेकी इच्छाका त्याग कर दिया ॥ ४२ ॥

ततो युधिष्ठिरः प्राह पाण्डवान् पुरुषर्षभ । पितामहस्य यद् वाक्यं तद् वो रोचत्विति प्रभुः ॥ ४३ ॥ पुरुषप्रवर! तब शक्तिशाली राजा युधिष्ठिरने पाण्डवोंसे कहा—'वीरमार्गके विषयमें पितामहका जो कथन है, उसीमें तुम सब लोगोंकी रुचि होनी चाहिये' ॥

ततस्तु पाण्डवाः सर्वे द्रौपदी च यशस्विनी । युधिष्ठिरस्य तद् वाक्यं बाढमित्यभ्यपूजयन् ॥ ४४ ॥ तब समस्त पाण्डवों तथा यशस्विनी द्रौपदी देवीने 'बहुत अच्छा' कहकर युधिष्ठिरके उस वचनका आदर किया ॥ ४४ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५७ ॥