भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 564, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 564

इस प्रकार यह मैंने तालाब बनवानेके उत्तम फलका वर्णन किया है। इसके बाद वृक्ष लगानेका माहात्म्य बतलाऊँगा ॥ २२ ॥

स्थावराणां च भूतानां जातयः षट् प्रकीर्तिताः । वृक्षगुल्मलतावल्ल्यस्त्वक्सारास्तृणजातयः ॥ २३ ॥ स्थावर भूतोंकी छः जातियाँ बतायी गयी हैं—वृक्ष (बड़-पीपल आदि), गुल्म (कुश आदि), लता (वृक्षपर फैलनेवाली बेल), वल्ली (जमीनपर फैलनेवाली बेल), त्वक्सार (बाँस आदि) और तृण (घास आदि) ॥ २३ ॥

एता जात्यस्तु वृक्षाणां तेषां रोपे गुणास्त्विमे । कीर्तिंश्च मानुषे लोके प्रेत्य चैव फलं शुभम् ॥ २४ ॥ ये वृक्षोंकी जातियाँ हैं। अब इनके लगानेसे जो लाभ हैं, वे यहाँ बताये जाते हैं। वृक्ष लगानेवाले मनुष्यकी इस लोकमें कीर्ति बनी रहती है और मरनेके बाद उसे उत्तम शुभ फलकी प्राप्ति होती है ॥ २४ ॥

लभते नाम लोके च पितृभिश्च महीयते । देवलोके गतस्यापि नाम तस्य न नश्यति ॥ २५ ॥ संसारमें उसका नाम होता है, परलोकमें पितर उसका सम्मान करते हैं तथा देवलोकमें चले जानेपर भी यहाँ उसका नाम नष्ट नहीं होता ॥ २५ ॥

अतीतानागते चोभे पितृवंशं च भारत । तारयेद् वृक्षरोपी च तस्माद् वृक्षांश्च रोपयेत् ॥ २६ ॥ भरतनन्दन! वृक्ष लगानेवाला पुरुष अपने मरे हुए पूर्वजों और भविष्यमें होनेवाली संतानोंका तथा पितृकुलका भी उद्धार कर देता है, इसलिये वृक्षोंको अवश्य लगाना चाहिये ॥ २६ ॥

तस्य पुत्रा भवन्त्येते पादपा नात्र संशयः । परलोकगतः स्वर्गं लोकांश्चाप्नोति सोऽव्ययान् ॥ २७ ॥ जो वृक्ष लगाता है, उसके लिये ये वृक्ष पुत्ररूप होते हैं, इसमें संशय नहीं है। उन्हींके कारण परलोकमें जानेपर उसे स्वर्ग तथा अक्षय लोक प्राप्त होते हैं ॥ २७ ॥

पुष्पैः सुरगणान् वृक्षाः फलैश्चापि तथा पितॄन् । छायया चातिथिं तात पूजयन्ति महीरुहः ॥ २८ ॥ तात! वृक्षगण अपने फूलोंसे देवताओंकी, फलोंसे पितरोंकी और छायासे अतिथियोंकी पूजा करते हैं ॥ २८ ॥

किन्नरोरगरक्षांसि देवगन्धर्वमानवाः । तथा ऋषिगणाश्चैव संश्रयन्ति महीरुहान् ॥ २९ ॥ किन्नर, नाग, राक्षस, देवता, गन्धर्व, मनुष्य और ऋषियोंके समुदाय—ये सभी वृक्षोंका आश्रय लेते हैं ॥