भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 571, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 571

छोटे-बड़े और बड़ोंसे भी बड़े जो क्षत्रिय तेज और बलसे तप रहे हैं, उन सबके तेज और तप ब्राह्मणोंके पास जाते ही शान्त हो जाते हैं ।। ३५-३६ ।। न मे पिता प्रियतरो न त्वं तात तथा प्रियः । न मे पितुः पिता राजन् न चात्मा न च जीवितम् ।। ३७ ।। तात! मुझे ब्राह्मण जितने प्रिय हैं, उतने मेरे पिता, तुम, पितामह, यह शरीर और जीवन भी प्रिय नहीं हैं ।। त्वत्तश्च मे प्रियतरः पृथिव्यां नास्ति कश्चन । त्वत्तोऽपि मे प्रियतरा ब्राह्मणा भरतर्षभ ।। ३८ ।। भरतश्रेष्ठ! इस पृथ्वीपर तुमसे अधिक प्रिय मेरे लिये दूसरा कोई नहीं है; परंतु ब्राह्मण तुमसे भी बढ़कर प्रिय हैं ।। ३८ ।। ब्रवीमि सत्यमेतच्च यथाहं पाण्डुनन्दन । तेन सत्येन गच्छेयं लोकान् यत्र च शान्तनुः ।। ३९ ।। पाण्डुनन्दन! मैं यह सच्ची बात कह रहा हूँ और चाहता हूँ कि इस सत्यके प्रभावसे मैं उन्हीं लोकोंमें जाऊँ जहाँ मेरे पिता शान्तनु गये हैं ।। ३९ ।। पश्येयं च सतां लोकान् शुचीन् ब्रह्मपुरस्कृतान् । तत्र मे तात गन्तव्यमह्नाय च चिराय च ।। ४० ।। इस सत्यके प्रभावसे ही मैं सत्पुरुषोंके उन पवित्र लोकोंका दर्शन कर रहा हूँ जहाँ ब्राह्मणों और ब्रह्माजीकी प्रधानता है। तात! मुझे शीघ्र ही चिरकालके लिये उन लोकोंमें जाना है ।। ४० ।। सोऽहमेतादृशाँल्लोकान् दृष्ट्वा भरतसत्तम । यन्मे कृतं ब्राह्मणेषु न तप्ये तेन पार्थिव ।। ४१ ।। भरतश्रेष्ठ! पृथ्वीनाथ! ब्राह्मणोंके लिये मैंने जो कुछ किया है, उसके फलस्वरूप ऐसे पुण्यलोकोंका दर्शन करके मुझे संतोष हो गया है। अब मैं इस बातके लिये संतप्त नहीं हूँ कि दूसरा कोई पुण्य क्यों नहीं किया? ।। ४१ ।।

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि एकोनषष्टितमोऽध्यायः ।। ५९ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें उनसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ५९ ।।