भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 584, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 584

तस्मात् प्राप्यैव पृथिवीं दद्यात् विप्राय पार्थिवः ॥ १४ ॥
वह पुनर्जन्म पाकर राजाके समान ही होता है, इसमें संशय नहीं है। अतः राजाको चाहिये कि वह पृथ्वीपर अधिकार पाते ही उसमेंसे कुछ ब्राह्मणको दान करे ॥ १४ ॥
नाभूमिपतिना भूमिरधितिष्ठेया कथंचन ।
न चापात्रेण वा ग्राह्या दत्तदाने न चाचरेत् ॥ १५ ॥
जो जिस भूमिका स्वामी नहीं है, उसे उसपर किसी तरह अधिकार नहीं करना चाहिये तथा अयोग्य पात्रको भूमिदान नहीं ग्रहण करना चाहिये। जिस भूमिको दानमें दे दिया गया हो, उसे अपने उपयोगमें नहीं लाना चाहिये ॥ १५ ॥
ये चान्ये भूमिमिच्छेयुः कुर्युुरेवं न संशयः ।
यः साधोर्भूमिमादत्ते न भूमिं विन्दते तु सः ॥ १६ ॥
दूसरे भी जो लोग भावी जन्ममें भूमि पानेकी इच्छा करें, उन्हें भी इस जन्ममें इसी तरह भूमिदान करना चाहिये। इसमें संशय नहीं है। जो छल-बलसे श्रेष्ठ पुरुषकी भूमिका अपहरण कर लेता है, उसे भूमिकी प्राप्ति नहीं होती ॥ १६ ॥
भूमिं दत्त्वा तु साधुभ्यो विन्दते भूमिमुत्तमाम् ।
प्रेत्य चेह च धर्मात्मा सम्प्राप्नोति महत् यशः ॥ १७ ॥
श्रेष्ठ पुरुषोंको भूमिदान देनेसे दाताको उत्तम भूमिकी प्राप्ति होती है तथा वह धर्मात्मा पुरुष इहलोक और परलोकमें भी महान् यशका भागी होता है ॥ १७ ॥
(एकागारकरीं दत्त्वा षष्टिसाहस्रमूर्ध्वगः ।
तावत्या हरणे पृथ्व्या नरकं द्विगुणोत्तरम् ॥)
जो एक घर बनाने भरके लिये भूमि दान करता है, वह साठ हजार वर्षोंतक ऊर्ध्वलोकमें निवास करता है। तथा जो उतनी ही पृथ्वीका हरण कर लेता है, उसे उससे दूने अधिक कालतक नरकमें रहना पड़ता है ॥
यस्य विप्रास्तु शंसन्ति साधोर्भूमिं सदैव हि ।
न तस्य शत्रवो राजन् प्रशंसन्ति वसुन्धराम् ॥ १८ ॥
राजन्! ब्राह्मण जिस श्रेष्ठ पुरुषकी दी हुई भूमिकी सदा ही प्रशंसा करते हैं, उसकी उस भूमिकी राजाके शत्रु प्रशंसा नहीं करते हैं ॥ १८ ॥
यत् किंचित् पुरुषः पापं कुरुते वृत्तिकर्शितः ।
अपि गोचर्ममात्रेण भूमिदानेन पूयते ॥ १९ ॥
जीविका न होनेके कारण मनुष्य क्लेशमें पड़कर जो कुछ पाप कर डालता है, वह सारा पाप गोचर्मके बराबर भूमि-दान करनेसे धुल जाता है ॥ १९ ॥
येऽपि संकीर्णकर्माणो राजानो रौद्रकर्मिणः ।
तेभ्यः पवित्रमाख्येयं भूमिदानमनुत्तमम् ॥ २० ॥