महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 601, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंभरतनन्दन! इस प्रकार जब मेघसे पृथ्वीपर जल गिरता है, तब पृथ्वीदेवी स्निग्ध (गीली) होती है ॥ ३८ ॥
ततः सस्यानि रोहन्ति येन वर्तयते जगत् । मांसमेदोऽस्थिशुक्राणां प्रादुर्भावस्ततः पुनः ॥ ३९ ॥
फिर उस गीली धरतीसे अनाजके अंकुर उत्पन्न होते हैं, जिससे जगत्के जीवोंका निर्वाह होता है। अन्नसे ही शरीरमें मांस, मेदा, अस्थि और वीर्यका प्रादुर्भाव होता है ॥ ३९ ॥
सम्भवन्ति ततः शुक्रात् प्राणिनः पृथिवीपते । अग्नीषोमौ हि तच्छुक्रं सृजतः पुष्यतश्च ह ॥ ४० ॥
पृथिवीनाथ! उस वीर्यसे प्राणी उत्पन्न होते हैं। इस प्रकार अग्नि और सोम उस वीर्यकी सृष्टि और पुष्टि करते हैं ॥ ४० ॥
एवमन्नाद्धि सूर्यश्च पवनः शुक्रमेव च । एक एव स्मृतो राशिस्ततो भूतानि जज्ञिरे ॥ ४१ ॥
इस तरह सूर्य, वायु और वीर्य एक ही राशि हैं जो अन्नसे प्रकट हुए हैं। उन्हींसे समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति हुई है ॥ ४१ ॥
प्राणान् ददाति भूतानां तेजश्च भरतर्षभ । गृहमभ्यागतायाथ यो दद्यादन्नमर्थिने ॥ ४२ ॥
भरतश्रेष्ठ! जो घरपर आये हुए याचकको अन्न देता है, वह सब प्राणियोंको प्राण और तेजका दान करता है ॥ ४२ ॥
भीष्म उवाच
नारदेनैवमुक्तोऽहमदामन्नं सदा नृप । अनसूयुस्त्वमप्यन्नं तस्माद् देहि गतज्वरः ॥ ४३ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**नरेश्वर! जब नारदजीने मुझे इस प्रकार अन्न-दानका माहात्म्य बतलाया, तबसे मैं नित्य अन्नका दान किया करता था। अतः तुम भी दोषदृष्टि और जलन छोड़कर सदा अन्न-दान करते रहना ॥ ४३ ॥
दत्त्वान्नं विधिवद् राजन् विप्रेभ्यस्त्वमिति प्रभो । यथावदनुरूपेभ्यस्ततः स्वर्गमवाप्स्यसि ॥ ४४ ॥
राजन्! प्रभो! तुम सुयोग्य ब्राह्मणोंको विधिपूर्वक अन्नका दान करके उसके पुण्यसे स्वर्गलोकको प्राप्त कर लोगे ॥ ४४ ॥
अन्नदानां हि ये लोकास्तांस्त्वं शृणु जनाधिप । भवनानि प्रकाशन्ते दिवि तेषां महात्मनाम् ॥ ४५ ॥