भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 604, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 604

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चतुःषष्टितमोऽध्यायः

विभिन्न नक्षत्रोंके योगमें भिन्न-भिन्न वस्तुओंके दानका माहात्म्य

युधिष्ठिर उवाच
श्रुतं मे भवतो वाक्यमन्नदानस्य यो विधिः ।
नक्षत्रयोगस्येदानीं दानकल्पं ब्रवीहि मे ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! मैंने आपका उपदेश सुना। अन्नदानका जो विधान है, वह ज्ञात हुआ। अब मुझे यह बताइये कि किस नक्षत्रका योग प्राप्त होनेपर किस-किस वस्तुका दान करना उत्तम है ॥ १ ॥

भीष्म उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
देवक्याश्चैव संवादं महर्षेर्नारदस्य च ॥ २ ॥
**भीष्मजीने कहा—**युधिष्ठिर! इस विषयमें जानकार मनुष्य देवकी देवी और महर्षि नारदके संवादरूप प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ २ ॥
द्वारकामनुसम्प्राप्तं नारदं देवदर्शनम् ।
पप्रच्छेदं वचः प्रश्नं देवकी धर्मदर्शनम् ॥ ३ ॥
एक समयकी बात है, धर्मदर्शी देवर्षि नारदजी द्वारकामें आये थे। उस समय वहाँ देवकी देवीने उनके सामने यही प्रश्न उपस्थित किया ॥ ३ ॥
तस्याः सम्पृच्छमानाया देवर्षिर्नारदस्ततः ।
आचष्ट विधिवत् सर्वं तच्छृणुष्व विशाम्पते ॥ ४ ॥
प्रजानाथ! देवकीके इस प्रकार पूछनेपर देवर्षि नारदने उस समय विधिपूर्वक सब बातें बतायीं। वे ही बातें मैं तुमसे कहता हूँ, सुनो ॥ ४ ॥

नारद उवाच
कृत्तिकासु महाभागे पायसेन ससर्पिषा ।
संतर्प्य ब्राह्मणान् साधूँल्लोकानाप्नोत्यनुत्तमान् ॥ ५ ॥
**नारदजीने कहा—**महाभागे! कृत्तिका नक्षत्र आनेपर मनुष्य घृतयुक्त खीरके द्वारा श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको तृप्त करे। इससे वह सर्वोत्तम लोकोंको प्राप्त होता है ॥
रोहिण्यां प्रसृतैर्मार्गैर्मांसैरन्नेन सर्पिषा ।
पयोऽन्नपानं दातव्यमनृणार्थं द्विजातये ॥ ६ ॥