भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 606, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 606

उत्तराफाल्गुनी नक्षत्रमें विधिपूर्वक घृत और दुग्धसे युक्त साठीके चावलके भातका दान करनेसे मनुष्य स्वर्गलोकमें सम्मानित होता है ।। १४ ।।

यद् यत् प्रदीयते दानमुत्तराविषये नरैः ।
महाफलमनन्तं तद् भवतीति विनिश्चयः ।। १५ ।।
उत्तरा नक्षत्रमें मनुष्य जो-जो दान देते हैं, वह महान् फलसे युक्त एवं अनन्त होता है—यह शास्त्रोंका निश्चय है ।। १५ ।।

हस्ते हस्तिरथं दत्त्वा चतुर्युक्तमुपोषितः ।
प्राप्नोति परमाँल्लोकान् पुण्यकामसमन्वितान् ।। १६ ।।
हस्तनक्षत्रमें उपवास करके ध्वजा, पताका, चँदोवा और किंकिणीजाल—इन चार वस्तुओंसे युक्त हाथी जुते हुए रथका दान करनेवाला मनुष्य पवित्र कामनाओंसे युक्त उत्तम लोकोंमें जाता है ।। १६ ।।

चित्रायां वृषभं दत्त्वा पुण्यगन्धांश्च भारत ।
चरन्त्यप्सरसां लोके रमन्ते नन्दने तथा ।। १७ ।।
भारत! जो लोग चित्रा नक्षत्रमें वृषभ एवं पवित्र गन्धका दान करते हैं, वे अप्सराओंके लोकमें विचरते और नन्दनवनमें रमण करते हैं ।। १७ ।।

स्वात्यामथ धनं दत्त्वा यदिष्टममात्मनः ।
प्राप्नोति लोकान् स शुभानिह चैव महद् यशः ।। १८ ।।
स्वाती नक्षत्रमें अपनी अधिक-से-अधिक प्रिय वस्तुका दान करके मनुष्य शुभ लोकोंमें जाता है और इस जगत्में भी महान् यशका भागी होता है ।। १८ ।।

विशाखायामनड्वाहं धेनुं दत्त्वा च दुग्धदाम् ।
सप्रासंगं च शकटं सधान्यं वस्त्रसंयुतम् ।। १९ ।।
पितॄन् देवांश्च प्रीणाति प्रेत्य चानन्त्यमश्नुते ।
न च दुर्गाण्यवाप्नोति स्वर्गलोकं च गच्छति ।। २० ।।
जो विशाखा नक्षत्रमें गाड़ी ढोनेवाले बैल, दूध देनेवाली गाय, धान्य, वस्त्र और प्रासंगसहित शकट दान करता है, वह देवताओं और पितरोंको तृप्त कर देता है तथा मृत्युके पश्चात् अक्षय सुखका भागी होता है। वह जीते जी कभी संकटमें नहीं पड़ता और मरनेके बाद स्वर्गलोकमें जाता है ।। १९-२० ।।

दत्त्वा यथोक्तं विप्रेभ्यो वृत्तिमिष्टां स विन्दति ।
नरकादींश्च संक्लेशान् नाप्नोतीति विनिश्चयः ।। २१ ।।
पूर्वोक्त वस्तुओंका ब्राह्मणोंको दान करके मनुष्य इच्छित जीविका-वृत्ति पा लेता है और नरक आदिके कष्ट भी कभी नहीं भोगता। ऐसा शास्त्रोंका निश्चय है ।।

अनुराधासु प्रावारं वरान्नं समुपोषितः ।
दत्त्वा युगशतं चापि नरः स्वर्गे महीयते ।। २२ ।।