भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 608, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 608

प्राप्नोत्यप्सरसां संघान् प्रेत्य गन्धांश्च शाश्वतान् ॥ ३० ॥ जो शतभिषा नक्षत्रके योगमें अगुरु और चन्दन-सहित सुगन्धित पदार्थोंका दान करता है, वह परलोकमें अप्सराओंके समुदाय तथा अक्षय गन्धको पाता है ॥ ३० ॥

पूर्वाभाद्रपदायोगे राजमाषान् प्रदाय तु । सर्वभक्षफलोपेतः स वै प्रेत्य सुखी भवेत् ॥ ३१ ॥ पूर्वाभाद्रपदा नक्षत्रके योगमें बड़ी उड़द या सफेद मटरका दान करके मनुष्य परलोकमें सब प्रकारकी खाद्य वस्तुओंसे सम्पन्न हो सुखी होता है ॥ ३१ ॥

औरभ्रमुत्तरायोगे यस्तु मांसं प्रयच्छति । स पितॄन् प्रीणयति वै प्रेत्य चानन्त्यमश्नुते ॥ ३२ ॥ जो उत्तराभाद्रपदा नक्षत्रके योगमें औरभ्र फलका गूदा दान करता है, वह पितरोंको तृप्त करता और परलोकमें अक्षय सुखका भागी होता है ॥ ३२ ॥

कांस्योपदोहनां धेनुं रेवत्यां यः प्रयच्छति । सा प्रेत्य कामानादाय दातारमुपतिष्ठति ॥ ३३ ॥ जो रेवती नक्षत्रमें कांसके दुग्धपात्रसे युक्त धेनुका दान करता है वह धेनु परलोकमें सम्पूर्ण भोगोंको लेकर उस दाताकी सेवामें उपस्थित होती है ॥ ३३ ॥

रथमश्वसमायुक्तं दत्त्वाश्विन्यां नरोत्तमः । हस्त्यश्वरथसम्पन्ने वर्चस्वी जायते कुले ॥ ३४ ॥ जो नरश्रेष्ठ अश्विनी नक्षत्रमें घोड़े जुते हुए रथका दान करता है, वह हाथी, घोड़े और रथसे सम्पन्न कुलमें तेजस्वी पुत्ररूपसे जन्म लेता है ॥ ३४ ॥

भरणीषु द्विजातिभ्यस्तिलधेनुं प्रदाय वै । गाः सुप्रभूताः प्राप्नोति नरः प्रेत्य यशस्तथा ॥ ३५ ॥ जो भरणी नक्षत्रमें ब्राह्मणोंको तिलमयी धेनुका दान करता है, वह इस लोकमें बहुत-सी गौओंको तथा परलोकमें महान् यशको प्राप्त करता है ॥ ३५ ॥

भीष्म उवाच

इत्येष लक्षणोद्देशः प्रोक्तो नक्षत्रयोगतः । देवक्या नारदेनेह सा स्नुषाभ्योऽब्रवीदिदम् ॥ ३६ ॥ भीष्मजी कहते हैं—राजन्! इस प्रकार नक्षत्रोंके योगमें किये जानेवाले विविध वस्तुओंके दानका संक्षेपसे यहाँ वर्णन किया गया है। नारदजीने देवकीसे और देवकीजीने अपनी पुत्रवधुओंसे यह विषय सुनाया था ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि नक्षत्रयोगदानं नाम चतुःषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६४ ॥