भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 618, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 618

वन, पर्वत, नदी और तीर्थ—ये सब स्थान किसी स्वामीके अधीन नहीं होते हैं (इन्हें सार्वजनिक माना जाता है)। इसलिये वहाँ श्राद्ध करनेके लिये भूमि खरीदनेकी आवश्यकता नहीं है। प्रजानाथ! इस प्रकार यह भूमिदानका फल बताया गया है।। ३५-३६ ।।

अतः परं तु गोदानं कीर्तयिष्यामि तेऽनघ ।
गावोऽधिकास्तपस्विभ्यो यस्मात् सर्वेभ्य एव च ।। ३७ ।।
तस्मान्महेश्वरो देवस्तपस्ताभिः सहास्थितः ।
अनघ! इसके बाद मैं तुम्हें गोदानका माहात्म्य बताऊँगा। गौएँ समस्त तपस्वियोंसे बढ़कर हैं; इसलिये भगवान् शंकरने गौओंके साथ रहकर तप किया था।। ३७ १/२ ।।

ब्राह्मो लोके वसन्त्येताः सोमेन सह भारत ।। ३८ ।।
यां तां ब्रह्मर्षयः सिद्धाः प्रार्थयन्ति परां गतिम् ।
भारत! ये गौएँ चन्द्रमाके साथ उस ब्रह्मलोकमें निवास करती हैं, जो परमगतिरूप है और जिसे सिद्ध ब्रह्मर्षि भी प्राप्त करनेकी इच्छा रखते हैं।। ३८ १/२ ।।

पयसा हविषा दध्ना शकृता चाथ चर्मणा ।। ३९ ।।
अस्थिभिश्चोपकुर्वन्ति शृंगैर्वालैश्च भारत ।
भरतनन्दन! ये गौएँ अपने दूध, दही, घी, गोबर, चमड़ा, हड्डी, सींग और बालोंसे भी जगत्का उपकार करती रहती हैं।। ३९ १/२ ।।

नासां शीतातपौ स्यातां सदैताः कर्म कुर्वते ।। ४० ।।
न वर्षविषयं वापि दुःखमासां भवत्युत ।
ब्राह्मणैः सहिता यान्ति तस्मात् पारमकं पदम् ।। ४१ ।।
इन्हें सर्दी, गर्मी और वर्षाका भी कष्ट नहीं होता है। ये सदा ही अपना काम किया करती हैं। इसलिये ये ब्राह्मणोंके साथ परमपदस्वरूप ब्रह्मलोकमें चली जाती हैं।। ४०-४१ ।।

एकं गोब्राह्मणं तस्मात् प्रवदन्ति मनीषिणः ।
रन्तिदेवस्य यज्ञे ताः पशुत्वेनोपकल्पिताः ।। ४२ ।।
अतश्चर्मण्वती राजन् गोचर्मभ्यः प्रवर्तिता ।
पशुत्वाच्च विनिर्मुक्ताः प्रदानायोपकल्पिताः ।। ४३ ।।
इसीसे गौ और ब्राह्मणको मनस्वी पुरुष एक बताते हैं। राजन्! राजा रन्तिदेवके यज्ञमें वे पशुरूपसे दान देनेके लिये निश्चित की गयी थीं; अतः गौओंके चमड़ोंसे वह चर्मण्वती नामक नदी प्रवाहित हुई थी। वे सभी गौएँ पशुत्वसे विमुक्त थीं और दान देनेके लिये नियत की गयी थीं।। ४२-४३ ।।

ता इमा बिप्रमुख्येभ्यो यो ददाति महीपते ।
निस्तरेदापदं कृच्छ्रां विषमस्थोऽपि पार्थिव ।। ४४ ।।

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