महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 627, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण उवाच
यत् तत्र कृत्वा सुमहत् पुण्यं स्यात् तद् ब्रवीहि मे।
सर्वस्य हि प्रमाणं त्वं त्रैलोक्यस्यापि सत्तम॥ १५॥
ब्राह्मणने कहा— साधुशिरोमणे! संसारमें जो कर्म करनेसे महान् पुण्य होता हो वह मुझे बताइये; क्योंकि समस्त त्रिलोकीके लिये धर्मके विषयमें आप ही प्रमाण हैं॥ १५॥
यम उवाच
शृणु तत्त्वेन विप्रर्षे प्रदानविधिमुत्तमम्।
तिलाः परमकं दानं पुण्यं चैवेह शाश्वतम्॥ १६॥
यमने कहा— ब्रह्मर्षे! तुम यथार्थरूपसे दानकी उत्तम विधि सुनो। तिलका दान सब दानोंमें उत्तम है। वह यहाँ अक्षय पुण्यजनक माना गया है॥ १६॥
तिलाश्च सम्प्रदातव्या यथाशक्ति द्विजर्षभ।
नित्यदानात् सर्वकामांस्तिला निर्वर्तयन्त्युत॥ १७॥
द्विजश्रेष्ठ! अपनी शक्तिके अनुसार तिलोंका दान अवश्य करना चाहिये। नित्यदान करनेसे तिल दाताकी सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण कर देते हैं॥ १७॥
तिलान् श्राद्धे प्रशंसन्ति दानमेतद्ध्यनुत्तमम्।
तान् प्रयच्छस्व विप्रेभ्यो विधिदृष्टेन कर्मणा॥ १८॥
श्राद्धमें विद्वान् पुरुष तिलोंकी प्रशंसा करते हैं। यह तिलदान सबसे उत्तम दान है। अतः तुम शास्त्रीय विधिके अनुसार ब्राह्मणोंको तिलदान देते रहो॥ १८॥
वैशाख्यां पौर्णमास्यां तु तिलान् दद्याद् द्विजातिषु।
तिला भक्षयितव्याश्च सदा त्वालम्भनं च तैः॥ १९॥
वैशाखकी पूर्णिमाको ब्राह्मणोंके लिये तिलदान दे, तिल खाये और सदा तिलोंका ही उबटन लगाये॥ १९॥
कार्यं सततमिच्छद्भिः श्रेयः सर्वात्मना गृहे।
तथाऽऽपः सर्वदा देयाः पेयाश्चैव न संशयः॥ २०॥
जो सदा कल्याणकी इच्छा रखते हैं, उन्हें सब प्रकारसे अपने घरमें तिलोंका दान और उपयोग करना चाहिये। इसी प्रकार सर्वदा जलका दान और पान करना चाहिये—इसमें संशय नहीं है॥ २०॥
पुष्करिण्यस्तडागानि कूंपांश्चैवात्र खानयेत्।
एतत् सुदुर्लभतरमिहलोके द्विजोत्तम॥ २१॥
द्विजश्रेष्ठ! मनुष्यको यहाँ पोखरी, तालाब और कुएँ खुदवाने चाहिये। यह इस संसारमें अत्यन्त दुर्लभ—पुण्य कार्य है॥ २१॥
आपो नित्यं प्रदेयास्ते पुण्यं ह्येतदनुत्तमम्।