भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 629, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 629

रत्नदानं च सुमहत् पुण्यमुक्तं जनाधिप । यस्तान् विक्रीय यजते ब्राह्मणो ह्यभयंकरम् ॥ २९ ॥ जनेश्वर! रत्नदानका भी बहुत बड़ा पुण्य बताया गया है। जो ब्राह्मण दानमें मिले हुए रत्नको बेचकर उसके द्वारा यज्ञ करता है, उसके लिये वह प्रतिग्रह भयदायक नहीं होता ॥ २९ ॥

यद् वै ददाति विप्रेभ्यो ब्राह्मणः प्रतिगृह्य वै । उभयोः स्यात् तदक्षय्यं दातुरादातुरेव च ॥ ३० ॥ जो ब्राह्मण किसी दातासे रत्नोंका दान लेकर स्वयं भी उसे ब्राह्मणोंको बाँट देता है तो उस दानके देने और लेनेवाले दोनोंको अक्षय पुण्य प्राप्त होता है ॥ ३० ॥

यो ददाति स्थितः स्थित्यां तादृशाय प्रतिग्रहम् । उभयोरक्षयं धर्मं तं मनुः प्राह धर्मवित् ॥ ३१ ॥ जो पुरुष स्वयं धर्ममर्यादामें स्थित होकर अपने ही समान स्थितिवाले ब्राह्मणको दानमें मिली हुई वस्तुका दान करता है, उन दोनोंको अक्षय धर्मकी प्राप्ति होती है। यह धर्मज्ञ मनुका वचन है ॥ ३१ ॥

वाससां सम्प्रदानेन स्वदारनिरतो नरः । सुवस्त्रश्च सुवेषश्च भवतीत्यनुशुश्रुम ॥ ३२ ॥ जो मनुष्य अपनी ही स्त्रीमें अनुराग रखता हुआ वस्त्र दान करता है, वह सुन्दर वस्त्र और मनोहर वेष-भूषासे सम्पन्न होता है—ऐसा हमने सुन रखा है ॥ ३२ ॥

गावः सुवर्णं च तथा तिलाश्चैवानुवर्णिताः । बहुशः पुरुषव्याघ्र वेदप्रामाण्यदर्शनात् ॥ ३३ ॥ पुरुषसिंह! मैंने गौ, सुवर्ण और तिलके दानका माहात्म्य अनेकों बार वेद-शास्त्रके प्रमाण दिखाकर वर्णन किया है ॥ ३३ ॥

विवाहांश्चैव कुर्वीत पुत्रानुत्पादयेत च । पुत्रलाभो हि कौरव्य सर्वलाभाद् विशिष्यते ॥ ३४ ॥ कुरुनन्दन! मनुष्य विवाह करे और पुत्र उत्पन्न करे। पुत्रका लाभ सब लाभोंसे बढ़कर है ॥ ३४ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि यमब्राह्मणसंवादे अष्टषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६८ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें यम और ब्राह्मणका संवादविषयक अड़सठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६८ ॥