भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 631, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 631

इसी प्रकार गोदानकी भी प्रशंसा की गयी है। उससे बढ़कर कोई दान नहीं है। युधिष्ठिर! गोदानका फल निकट भविष्यमें मिलता है तथा वे गौएँ शीघ्र अभीष्ट अर्थकी सिद्धि करती हैं।। ६ ।। मातरः सर्वभूतानां गावः सर्वसुखप्रदाः । वृद्धिमाकाङ्क्षता नित्यं गावः कार्याः प्रदक्षिणाः ।। ७ ।। गौएँ सम्पूर्ण प्राणियोंकी माता कहलाती हैं। वे सबको सुख देनेवाली हैं। जो अपने अभ्युदयकी इच्छा रखता हो, उसे गौओंको सदा दाहिने करके चलना चाहिये ।। ७ ।। संताड्या न तु पादेन गवां मध्ये न च व्रजेत् । मंगलायतनं देव्यस्तस्मात् पूज्याः सदैव हि ।। ८ ।। गौओंको लात न मारे। उनके बीचसे होकर न निकले। वे मंगलकी आधारभूत देवियाँ हैं, अतः उनकी सदा ही पूजा करनी चाहिये ।। ८ ।। प्रचोदनं देवकृतं गवां कर्मसु वर्तताम् । पूर्वमेवाक्षरं चान्यदभिधेयं ततः परम् ।। ९ ।। देवताओंने भी यज्ञके लिये भूमि जोतते समय बैलोंको डंडे आदिसे हाँका था। अतः पहले यज्ञके लिये ही बैलोंको जोतना या हाँकना श्रेयस्कर माना गया है। उससे भिन्न कर्मके लिये बैलोंको जोतना या डंडे आदिसे हाँकना निन्दनीय है ।। ९ ।। प्रचारे वा निवाते वा बुधो नोद्वेजयेत गाः । तृषिता ह्यभिवीक्षन्त्यो नरं हन्युः सबान्धवम् ।। १० ।। विद्वान् पुरुषको चाहिये कि जब गौएँ स्वच्छन्दता-पूर्वक विचर रही हों अथवा किसी उपद्रवशून्य स्थानमें बैठी हों तो उन्हें उद्वेगमें न डाले। जब गौएँ प्याससे पीड़ित हो जलकी इच्छासे अपने स्वामीकी ओर देखती हैं (और वह उन्हें पानी नहीं पिलाता है), तब वे रोषपूर्ण दृष्टिसे बन्धु-बान्धवोंसहित उसका नाश कर देती हैं ।। १० ।। पितृसद्मानि सततं देवतायतनानि च । पूयन्ते शकृता यासां पूतं किमधिकं ततः ।। ११ ।। जिनके गोबरसे लीपनेपर देवताओंके मन्दिर और पितरोंके श्राद्धस्थान पवित्र होते हैं, उनसे बढ़कर पावन और क्या हो सकता है? ।। ११ ।। ग्रासमुष्टिं परगवे दद्यात् संवत्सरं तु यः । अकृत्वा स्वयमाहारं व्रतं तत् सार्वकामिकम् ।। १२ ।। जो एक वर्षतक प्रतिदिन स्वयं भोजनके पहले दूसरेकी गायको एक मुट्ठी घास खिलाता है, उसका वह व्रत समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाला होता है ।। १२ ।। स हि पुत्रान् यशोऽर्थं च श्रियं चाप्यधिगच्छति । नाशयत्यशुभं चैव दुःस्वप्नं चाप्यपोहति ।। १३ ।।