महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 637, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ें‘उस समय मेरे ग्वालोंने दानके लिये मँगायी गयी एक हजार गौओंमें उसकी भी गिनती करा दी और मैंने परलोकमें मनोवांछित फलकी इच्छासे वह गौ भी एक ब्राह्मणको दे दी ॥ ११ ॥
अपश्यत् परिमार्गंश्च तां गां परगृहे द्विजः । ममेयमिति चोवाच ब्राह्मणो यस्य साभवत् ॥ १२ ॥
‘कुछ दिनों बाद जब वह ब्राह्मण परदेशसे लौटा, तब अपनी गाय ढूँढ़ने लगा। ढूँढ़ते-ढूँढ़ते जब वह गाय उसे दूसरेके घर मिली, तब उस ब्राह्मणने, जिसकी वह गौ पहले थी, उस दूसरे ब्राह्मणसे कहा—‘यह गाय तो मेरी है’ ॥ १२ ॥
तावुभौ समनुप्राप्तौ विवदन्तौ भृशज्वरौ । भवान् दाता भवान् हर्तेत्यथ तौ मामवोचताम् ॥ १३ ॥
‘फिर तो वे दोनों आपसमें लड़ पड़े और अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए मेरे पास आये। उनमेंसे एकने कहा—‘‘महाराज! यह गौ आपने मुझे दानमें दी है (और यह ब्राह्मण इसे अपनी बता रहा है)।” दूसरेने कहा—‘‘महाराज! वास्तवमें यह मेरी गाय है। आपने उसे चुरा लिया है” ॥ १३ ॥
शतेन शतसंख्येन गवां विनिमयेन वै ।