भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 658, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 658

न पारदारी पश्यति लोकमेतं न वै गुरुघ्नो न मृषा सम्प्रलापी । सदा प्रवादी ब्राह्मणेष्ववात्तवैरो दोषैरेतैश्च युक्तो दुरात्मा ॥ १४ ॥ न मित्रध्रुङ्नैकृतिकः कृतघ्नः शठोऽनृजुर्धर्मविद्वेषकश्च । न ब्रह्महा मनसापि प्रपश्येद् गवां लोकं पुण्यकृतां निवासम् ॥ १५ ॥ परस्त्रीगामी, गुरुहत्यारा, असत्यवादी, सदा बकवाद करनेवाला, ब्राह्मणोंसे वैर बाँध रखनेवाला, मित्रद्रोही, ठग, कृतघ्न, शठ, कुटिल, धर्मद्वेषी और ब्रह्महत्यारा—इन सब दोषोंसे युक्त दुरात्मा मनुष्य कभी मनसे भी गोलोकका दर्शन नहीं पा सकता; क्योंकि वहाँ पुण्यात्माओंका निवास है ॥ १४-१५ ॥

एतत् ते सर्वमाख्यातं निपुणेन सुरेश्वर । गोप्रदानरतानां तु फलं शृणु शतक्रतो ॥ १६ ॥ सुरेश्वर! शतक्रतो! यह सब मैंने तुम्हें विशेषरूपसे गोलोकका माहात्म्य बताया है। अब गोदान करनेवालोंको जो फल प्राप्त होता है, उसे सुनो ॥ १६ ॥

दायाद्यलब्धैरर्थैर्यो गाः क्रीत्वा सम्प्रयच्छति । धर्मार्जितान् धनैः क्रीतान् स लोकानाप्नुतेऽक्षयान् ॥ १७ ॥ जो पुरुष अपनी पैतृक सम्पत्तिसे प्राप्त हुए धनके द्वारा गौएँ खरीदकर उनका दान करता है, वह उस धनसे धर्मपूर्वक उपार्जित हुए अक्षय लोकोंको प्राप्त होता है ॥ १७ ॥

यो वै द्यूते धनं जित्वा गाः क्रीत्वा सम्प्रयच्छति । स दिव्यमयुतं शक्र वर्षाणां फलमश्नुते ॥ १८ ॥ शक्र! जो जूएमें धन जीतकर उसके द्वारा गायोंको खरीदता है और उनका दान करता है, वह दस हजार दिव्य वर्षोंतक उसके पुण्यफलका उपभोग करता है ॥ १८ ॥

दायाद्याद् याः स्म वै गावो न्यायपूर्वेरुपार्जिताः । प्रदद्यात् ताः प्रदातॄणां सम्भवन्त्यपि च ध्रुवाः ॥ १९ ॥ जो पैतृक-सम्पत्तिसे न्यायपूर्वक प्राप्त की हुई गौओंका दान करता है, ऐसे दाताओंके लिये वे गौएँ अक्षय फल देनेवाली हो जाती हैं ॥ १९ ॥

प्रतिगृह्य तु यो दद्याद् गाः संशुद्धेन चेतसा । तस्यापीहाक्षयाल्लोँकान् ध्रुवान् विद्धि शचीपते ॥ २० ॥ शचीपते! जो पुरुष दानमें गौएँ लेकर फिर शुद्ध हृदयसे उनका दान कर देता है, उसे भी यहाँ अक्षय एवं अटल लोकोंकी प्राप्ति होती है—यह निश्चितरूपसे समझ लो ॥ २० ॥

जन्मप्रभृति सत्यं च यो ब्रूयान्नियतेन्द्रियः ।