भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 660, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 660

नित्यं दद्यादेकभक्तः सदा च सत्ये स्थितो गुरुशुश्रूषिता च ॥ २७ ॥ वेदाध्यायी गोषु यो भक्तिमांश्च नित्यं दत्त्वा योऽभिनन्देत गाश्च । आजातितो यश्च गवां नमेत इदं फलं शक्र निबोध तस्य ॥ २८ ॥ इन्द्र! जो सदा एक समय भोजन करके नित्य गोदान करता है, सत्यमें स्थित होता है, गुरुकी सेवा और वेदोंका स्वाध्याय करता है, जिसके मनमें गौओंके प्रति भक्ति है, जो गौओंका दान देकर प्रसन्न होता है तथा जन्मसे ही गौओंको प्रणाम करता है, उसको मिलनेवाले इस फलका वर्णन सुनो ॥ २७-२८ ॥

यत् स्यादिष्ट्वा राजसूये फलं तु यत् स्यादिष्ट्वा बहुना काञ्चनेन । एतत् तुल्यं फलमप्याहुरग्र्यं सर्वे सन्तस्त्वृषयो ये च सिद्धाः ॥ २९ ॥ राजसूय यज्ञका अनुष्ठान करनेसे जिस फलकी प्राप्ति होती है तथा बहुत-से सुवर्णकी दक्षिणा देकर यज्ञ करनेसे जो फल मिलता है, उपर्युक्त मनुष्य भी उसके समान ही उत्तम फलका भागी होता है। यह सभी सिद्ध-संत-महात्मा एवं ऋषियोंका कथन है ॥ २९ ॥

योऽग्रं भक्तं किंचिदप्राश्य दद्याद् गोभ्यो नित्यं गोव्रती सत्यवादी । शान्तोऽलुब्धो गोसहस्रस्य पुण्यं संवत्सरेणाप्नुयात् सत्यशीलः ॥ ३० ॥ जो गोसेवाका व्रत लेकर प्रतिदिन भोजनसे पहले गौओंको गोग्रास अर्पण करता है तथा शान्त एवं निर्लोभ होकर सदा सत्यका पालन करता रहता है, वह सत्य-शील पुरुष प्रतिवर्ष एक सहस्र गोदान करनेके पुण्यका भागी होता है ॥ ३० ॥

यदेकभक्तमश्नीयाद् दद्यादेकं गवां च यत् । दशवर्षाण्यनन्तानि गोव्रती गोऽनुकम्पकः ॥ ३१ ॥ जो गोसेवाका व्रत लेनेवाला पुरुष गौओंपर दया करता और प्रतिदिन एक समय भोजन करके एक समयका अपना भोजन गौओंको दे देता है, इस प्रकार दस वर्षोंतक गोसेवामें तत्पर रहनेवाले पुरुषको अनन्त सुख प्राप्त होते हैं ॥ ३१ ॥

एकेनैव च भक्तेन यः क्रीत्वा गां प्रयच्छति । यावन्ति तस्या रोमाणि सम्भवन्ति शतक्रतो ॥ ३२ ॥ तावत् प्रदानात् स गवां फलमाप्नोति शाश्वतम् ।