महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजो दूसरेकी गाय चुराकर ब्राह्मणको दान करता है, वह गोदानका पुण्य भोगनेके लिये जितना समय शास्त्रोंमें बताया गया है, उतने ही समयतक नरक भोगता है ॥ ६ ॥ सुवर्णं दक्षिणामाहुर्गोप्रदाने महाद्युते । सुवर्णं परमित्युक्तं दक्षिणार्थमसंशयम् ॥ ७ ॥ महातेजस्वी इन्द्र! गोदानमें कुछ सुवर्णकी दक्षिणा देनेका विधान है। दक्षिणाके लिये सुवर्ण सबसे उत्तम बताया गया है। इसमें संशय नहीं है ॥ ७ ॥ गोप्रदानात् तारयते सप्त पूर्वांस्तथा परान् । सुवर्णं दक्षिणां कृत्वा तावद्द्विगुणमुच्यते ॥ ८ ॥ मनुष्य गोदान करनेसे अपनी सात पीढ़ी पहलेके पितरोंका और सात पीढ़ी आगे आनेवाली संतानोंका उद्धार करता है; किंतु यदि उसके साथ सोनेकी दक्षिणा भी दी जाय तो उस दानका फल दूना बताया गया है ॥ सुवर्णं परमं दानं सुवर्णं दक्षिणा परा । सुवर्णं पावनं शक्र पावनानां परं स्मृतम् ॥ ९ ॥ क्योंकि इन्द्र! सुवर्णका दान सबसे उत्तम दान है। सुवर्णकी दक्षिणा सबसे श्रेष्ठ है, तथा पवित्र करनेवाली वस्तुओंमें सुवर्ण ही सबसे अधिक पावन माना गया है ॥ ९ ॥ कुलानां पावनं प्राहुर्जातरूपं शतक्रतो । एषा मे दक्षिणा प्रोक्ता समासेन महाद्युते ॥ १० ॥ महातेजस्वी शतक्रतो! सुवर्ण सम्पूर्ण कुलोंको पवित्र करनेवाला बताया गया है। इस प्रकार मैंने तुमसे संक्षेपमें यह दक्षिणाकी बात बतायी ॥ १० ॥
भीष्म उवाच
एतत् पितामहेनोक्तमिन्द्राय भरतर्षभ । इन्द्रो दशरथायाह रामायाह पिता तथा ॥ ११ ॥ **भीष्मजी कहते हैं—**भरतश्रेष्ठ युधिष्ठिर! यह उपर्युक्त उपदेश ब्रह्माजीने इन्द्रको दिया। इन्द्रने राजा दशरथको तथा पिता दशरथने अपने पुत्र श्रीरामचन्द्रजीको दिया ॥ ११ ॥ राघवोऽपि प्रियभ्रात्रे लक्ष्मणाय यशस्विने । ऋषिभ्यो लक्ष्मणेनोक्तमरण्ये वसता प्रभो ॥ १२ ॥ प्रभो! श्रीरामचन्द्रजीने भी अपने प्रिय एवं यशस्वी भ्राता लक्ष्मणको इसका उपदेश दिया। फिर लक्ष्मणने भी वनवासके समय ऋषियोंको यह बात बतायी ॥ पारम्पर्यगतं चेदमृषयः संशितव्रताः । दुर्धरं धारयामासू राजानश्चैव धार्मिकाः ॥ १३ ॥ इस प्रकार परम्परासे प्राप्त हुए इस दुर्धर उपदेशको उत्तम व्रतका पालन करनेवाले ऋषि और धर्मात्मा राजालोग धारण करते आ रहे हैं ॥ १३ ॥