महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 669, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंवेत्तुमिच्छामि धर्मज्ञ परं कौतूहलं हि मे ॥ ७ ॥ धर्मज्ञ पितामह! यह सब मैं यथावत् रूपसे जानना चाहता हूँ। इसके लिये मेरे मनमें बड़ी उत्कण्ठा है ॥
भीष्म उवाच
यो व्रतं वै यथोद्दिष्टं तथा सम्प्रतिपद्यते । अखण्डं सम्यगारभ्य तस्य लोकाः सनातनाः ॥ ८ ॥ **भीष्मजीने कहा—**युधिष्ठिर! जो मनुष्य शास्त्रोक्त विधिसे किसी व्रतको आरम्भ करके उसे अखण्डरूपसे निभा देते हैं, उन्हें सनातन लोकोंकी प्राप्ति होती है ॥ ८ ॥
नियमानां फलं राजन् प्रत्यक्षमिह दृश्यते । नियमानां क्रतूनां च त्वयावाप्तमिदं फलम् ॥ ९ ॥ राजन्! संसारमें नियमोंके पालनका फल तो प्रत्यक्ष देखा जाता है। तुमने भी यह नियमों और यज्ञोंका ही फल प्राप्त किया है ॥ ९ ॥
स्वधीतस्यापि च फलं दृश्यतेऽमुत्र चेह च । इहलोकेऽथवा नित्यं ब्रह्मलोके च मोदते ॥ १० ॥ वेदोंके स्वाध्यायका फल भी इहलोक और परलोकमें भी देखा जाता है। स्वाध्यायशील द्विज इहलोक और ब्रह्मलोकमें भी सदा आनन्द भोगता है ॥ १० ॥
दमस्य तु फलं राजन् शृणु त्वं विस्तरेण मे । दान्ताः सर्वत्र सुखिनो दान्ताः सर्वत्र निर्वृताः ॥ ११ ॥ राजन्! अब तुम मुझसे विस्तारपूर्वक दम (इन्द्रियसंयम)के फलका वर्णन सुनो। जितेन्द्रिय पुरुष सर्वत्र सुखी और सर्वत्र संतुष्ट रहते हैं ॥ ११ ॥
यत्रेच्छागामिनो दान्ताः सर्वशत्रुनिषूदनाः । प्रार्थयन्ति च यद् दान्ता लभन्ते तन्न संशयः ॥ १२ ॥ वे जहाँ चाहते हैं वहीं चले जाते हैं और जिस वस्तुकी इच्छा करते हैं वही उन्हें प्राप्त हो जाती है। वे सम्पूर्ण शत्रुओंका अन्त कर देते हैं। इसमें संशय नहीं है ॥ १२ ॥
युज्यन्ते सर्वकामैर्हि दान्ताः सर्वत्र पाण्डव । स्वर्गे यथा प्रमोन्दन्ते तपसा विक्रमेण च ॥ १३ ॥ दानैर्यज्ञैश्च विविधैस्तथा दान्ताः क्षमान्विताः । पाण्डुनन्दन! जितेन्द्रिय पुरुष सर्वत्र सम्पूर्ण मनचाही वस्तुएँ प्राप्त कर लेते हैं। वे अपनी तपस्या, पराक्रम, दान तथा नाना प्रकारके यज्ञोंसे स्वर्गलोकमें आनन्द भोगते हैं। इन्द्रियोंका दमन करनेवाले पुरुष क्षमाशील होते हैं ॥ १३ १/२ ॥
दानाद् दमो विशिष्टो हि ददत्किंचित् द्विजातये ॥ १४ ॥ दाता कुप्यति नो दान्तस्तस्माद् दानात् परं दमः ।