महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 671, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंशूरान्वयानां निर्दिष्टं फलं शूरस्य चैव हि ॥ २२ ॥
शूरवीरोंके अनेक भेद बताये गये हैं। उन सबके तात्पर्य मुझसे सुनो। उन शूरोंके वंशजों तथा शूरोंके लिये जो फल बताया गया है, उसे बता रहा हूँ ॥ २२ ॥
यज्ञशूरा दमे शूराः सत्यशूरास्तथापरे ।
युद्धशूरास्तथैवोक्ता दानशूराश्च मानवाः ॥ २३ ॥
(बुद्धिशूरास्तथा चान्ये क्षमाशूरास्तथा परे ।)
कुछ लोग यज्ञशूर हैं। कुछ इन्द्रियसंयममें शूर होनेके कारण दमशूर कहलाते हैं। इसी प्रकार कितने ही मानव सत्यशूर, युद्धशूर, दानशूर, बुद्धिशूर तथा क्षमाशूर कहे गये हैं ॥ २३ ॥
सांख्यशूराश्च बहवो योगशूरास्तथापरे ।
अरण्ये गृहवासे च त्यागे शूरास्तथापरे ॥ २४ ॥
बहुत-से मनुष्य सांख्यशूर, योगशूर, वनवासशूर, गृहवासशूर तथा त्यागशूर हैं ॥ २४ ॥
आर्जवे च तथा शूराः शमे वर्तन्ति मानवाः ।
तैस्तैश्च नियमैः शूरा बहवः सन्ति चापरे ।
वेदाध्ययनशूराश्च शूराश्चाध्यापने रताः ॥ २५ ॥
गुरुशुश्रूषया शूराः पितृशुश्रूषयापरे ।
मातृशुश्रूषया शूरा भैक्ष्यशूरास्तथापरे ॥ २६ ॥
कितने मानव सरलता दिखानेमें शूरवीर हैं। बहुत-से शम (मनोनिग्रह) में ही शूरता प्रकट करते हैं। विभिन्न नियमोंद्वारा अपना शौर्य सूचित करनेवाले और भी बहुत-से शूरवीर हैं। कितने ही वेदाध्ययनशूर, अध्यापनशूर, गुरुशुश्रूषाशूर, पितृसेवाशूर, मातृसेवाशूर तथा भिक्षाशूर हैं ॥ २५-२६ ॥
अरण्ये गृहवासे च शूराश्चातिथिपूजने ।
सर्वे यान्ति पराँल्लोकान् स्वकर्मफलनिर्जितान् ॥ २७ ॥
कुछ लोग वनवासमें, कुछ गृहवासमें और कुछ लोग अतिथियोंकी सेवा-पूजामें शूरवीर होते हैं। ये सब-के-सब अपने कर्मफलोंद्वारा उपार्जित उत्तम लोकोंमें जाते हैं ॥ २७ ॥
धारणं सर्ववेदानां सर्वतीर्थावगाहनम् ।
सत्यं च ब्रुवतो नित्यं समं वा स्यान्न वा समम् ॥ २८ ॥
सम्पूर्ण वेदोंको धारण करना और समस्त तीर्थोंमें स्नान करना—इन सत्कर्मोंका पुण्य सदा सत्य बोलनेवाले पुरुषके पुण्यके बराबर हो सकता है या नहीं; इसमें सन्देह है। अर्थात् इनसे सत्य श्रेष्ठ है ॥ २८ ॥
अश्वमेधसहस्रं च सत्यं च तुलया धृतम् ।
अश्वमेधसहस्राद्धि सत्यमेव विशिष्यते ॥ २९ ॥