महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 679, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंये राजानो गोप्रदानानि दत्त्वा । लोकान् प्राप्ताः पुण्यशीलाः प्रवृत्ता- स्तान् मे राजन् कीर्त्यमानान् निबोध ॥ २४ ॥ राजन्! बृहस्पतिजीके इस उपदेशको सुनकर जिन राजाओंने गोदान करके उसके प्रभावसे उत्तम लोक प्राप्त किये तथा जो सदाके लिये पुण्यात्मा बनकर सत्कर्मोंमें प्रवृत्त हुए, उनके नामोंका उल्लेख करता हूँ, सुनो ॥ २४ ॥
उशीनरो विष्वगश्वो नृगश्च भगीरथो विश्रुतो यौवनाश्वः । मान्धाता वै मुचुकुन्दश्च राजा भूरिद्युम्नो नैषधः सोमकश्च ॥ २५ ॥ पुरूरवो भरतश्चक्रवर्ती यस्यान्ववाये भरताः सर्व एव । तथा वीरो दाशरथिश्च रामो ये चाप्यन्ये विश्रुताः कीर्तिमन्तः ॥ २६ ॥ तथा राजा पृथुकर्मा दिलीपो दिवं प्राप्तो गोप्रदानैर्विधिज्ञः । यज्ञैर्दानैस्तपसा राजधर्मै- र्मान्धाताभूद् गोप्रदानैश्च युक्तः ॥ २७ ॥ उशीनर, विष्वगश्व, नृग, भगीरथ, सुविख्यात युवनाश्वकुमार महाराज मान्धाता, राजा मुचुकुन्द, भूरिद्युम्न, निषधनरेश नल, सोमक, पुरूरवा, चक्रवर्ती भरत—जिनके वंशमें होनेवाले सभी राजा भारत कहलाये, दशरथनन्दन वीर श्रीराम, अन्यान्य विख्यात कीर्तिवाले नरेश तथा महान् कर्म करनेवाले राजा दिलीप—इन समस्त विधिज्ञ नरेशोंने गोदान करके स्वर्गलोक प्राप्त किया है। राजा मान्धाता तो यज्ञ, दान, तपस्या, राजधर्म तथा गोदान आदि सभी श्रेष्ठ गुणोंसे सम्पन्न थे ॥ २५—२७ ॥
तस्मात् पार्थ त्वमपीमां मयोक्तां बार्हस्पतीं भारतीं धारयस्व । द्विजाग्र्येभ्यः सम्प्रयच्छस्व प्रीतो गाः पुण्या वै प्राप्य राज्यं कुरूणाम् ॥ २८ ॥ अतः कुन्तीनन्दन! तुम भी मेरे कहे हुए बृहस्पतिजीके इस उपदेशको धारण करो और कौरव-राज्यपर अधिकार पाकर उत्तम ब्राह्मणको प्रसन्नतापूर्वक पवित्र गौओंका दान करो ॥ २८ ॥
वैशम्पायन उवाच