महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 710, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंमहदुग्रं तपः कृत्वा मां निषेवन्ति मानवाः । देवदानवगन्धर्वाः पिशाचोरगराक्षसाः ॥ १५ ॥ देवता, दानव, गन्धर्व, पिशाच, नाग, राक्षस और मनुष्य बड़ी उग्र तपस्या करके मेरी सेवाका सौभाग्य प्राप्त करते हैं ॥ १५ ॥
प्रभाव एष वो गावः प्रतिगृह्णीत मामिह । नावमन्या ह्यहं सौम्यास्त्रैलोक्ये सचराचरे ॥ १६ ॥ सौम्य स्वभाववाली गौओ! यह तुम्हारा प्रभाव है कि मैं स्वयं तुम्हारे पास आयी हूँ। अतः तुम मुझे यहाँ ग्रहण करो। चराचर प्राणियोंसहित समस्त त्रिलोकीमें कहीं भी मैं अपमान पानेके योग्य नहीं हूँ ॥ १६ ॥
गाव ऊचुः
नावमन्यामहे देवि न त्वां परिभवामहे । अध्रुवा चलचित्तासि ततस्त्वां वर्जयामहे ॥ १७ ॥ गौओंने कहा— देवि! हम तुम्हारा अपमान या अनादर नहीं करतीं। केवल तुम्हारा त्याग कर रही हैं। वह भी इसलिये कि तुम्हारा चित्त चंचल है। तुम कहीं भी स्थिर होकर नहीं रहती ॥ १७ ॥
बहुना च किमुक्तेन गम्यतां यत्र वाञ्छसि । वपुष्मन्त्यो वयं सर्वाः किमस्माकं त्वयानघे ॥ १८ ॥ इस विषयमें बहुत बात करनेसे क्या लाभ? तुम जहाँ जाना चाहो—चली जाओ। अनघे! हम सब लोगोंका शरीर तो यों ही हृष्ट-पुष्ट और सुन्दर है; अतः तुमसे हमें क्या काम है? ॥ १८ ॥
श्रीरुवाच
अवज्ञाता भविष्यामि सर्वलोकस्य मानदाः । प्रत्याख्यानेन युष्माकं प्रसादः क्रियतां मम ॥ १९ ॥ लक्ष्मीने कहा— दूसरोंको सम्मान देनेवाली गौओ! तुम्हारे त्याग देनेसे मैं सम्पूर्ण जगत्के लिये अवहेलित और उपेक्षित हो जाऊँगी, इसलिये मुझपर कृपा करो ॥ १९ ॥
महाभागा भवत्यो वै शरण्याः शरणागताम् । परित्रायन्तु मां नित्यं भजमानामनिन्दिताम् ॥ २० ॥ तुम महान् सौभाग्यशालिनी और सबको शरण देनेवाली हो। मैं भी तुम्हारी शरणमें आयी हूँ। तुम्हारी भक्त हूँ। मुझमें कोई दोष भी नहीं है; अतः तुम मेरी रक्षा करो—मुझे अपना लो ॥ २० ॥
माननामहमिच्छामि भवत्यः सततं शिवाः । अप्येकांगेष्वधो वस्तुमिच्छामि च सुकुत्सिते ॥ २१ ॥