महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 716, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंतच्च मे शृणु कात्स्न्येन वदतो बलसूदन । ‘सुरभी गौएँ पुण्यकर्म करनेवाली और शुभ-लक्षणा होती हैं। सुरश्रेष्ठ! बलसूदन! वे जिस उद्देश्यसे पृथ्वीपर गयी हैं, उसको भी मैं पूर्णरूपसे बता रहा हूँ, सुनो ।। २४½ ।।
पुरा देवयुगे तात देवेन्द्रेषु महात्मसु ।। २५ ।। त्रींल्लोकाननुशासत्सु विष्णौ गर्भत्वमागते । अदित्यास्तप्यमानायास्तपो घोरं सुदुश्चरम् ।। २६ ।। पुत्रार्थममरश्रेष्ठ पादेनैकेन नित्यदा । तां तु दृष्ट्वा महादेवीं तप्यमानां महत्तपः ।। २७ ।। दक्षस्य दुहिता देवी सुरभी नाम नामतः । अतप्यत तपो घोरं हृष्टा धर्मपरायणा ।। २८ ।। ‘तात! पहले सत्ययुगमें जब महामना देवेश्वरगण तीनों लोकोंपर शासन करते थे और अमरश्रेष्ठ! जब देवी अदिति पुत्रके लिये नित्य एक पैरसे खड़ी रहकर अत्यन्त घोर एवं दुष्कर तपस्या करती थी और उस तपस्यासे संतुष्ट होकर साक्षात् भगवान् विष्णु ही उनके गर्भमें पदार्पण करनेवाले थे उन्हीं दिनोंकी बात है, महादेवी अदितिको महान् तप करती देख दक्षकी धर्मपरायणा पुत्री सुरभी देवीने बड़े हर्षके साथ घोर तपस्या आरम्भ की ।। २५—२८ ।।
कैलासशिखरे रम्ये देवगन्धर्वसेविते । व्यतिष्ठदेकपादेन परमं योगमास्थिता ।। २९ ।। दशवर्षसहस्राणि दशवर्षशतानि च । संतप्तास्तपसा तस्या देवाः सर्षिमहोरगाः ।। ३० ।। ‘कैलासके रमणीय शिखरपर जहाँ देवता और गन्धर्व सदा विराजते रहते हैं, वहाँ वह उत्तम योगका आश्रय ले ग्यारह हजार वर्षोंतक एक पैरसे खड़ी रही। उसकी तपस्यासे देवता, ऋषि और बड़े-बड़े नाग भी संतप्त हो उठे ।। २९-३० ।।
तत्र गत्वा मया सार्धं पर्युपासन्त तां शुभाम् । अथाहमब्रुवं तत्र देवीं तां तपसान्विताम् ।। ३१ ।। ‘वे सब लोग मेरे साथ ही उस शुभलक्षणा तपस्विनी सुरभी देवीके पास जाकर खड़े हुए। तब मैंने वहाँ उससे कहा— ।। ३१ ।।
किमर्थं तप्यसे देवि तपो घोरमनिन्दिते । प्रीतस्तेऽहं महाभागे तपसानेन शोभने ।। ३२ ।। वरयस्व वरं देवि दातास्मीति पुरंदर ।। ३३ ।। ‘सती-साध्वी देवी! तुम किसलिये यह घोर तपस्या करती हो? शोभने! महाभागे! मैं तुम्हारी इस तपस्यासे बहुत संतुष्ट हूँ। देवि! तुम इच्छानुसार वर माँगो।” पुरंदर! इस तरह मैंने सुरभीको वर माँगनेके लिये प्रेरित किया ।। ३२-३३ ।।