महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 722, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंइनमें सुवर्ण सबसे उत्तम दक्षिणा है—ऐसा श्रुतिका वचन है, अतः पितामह! मैं इस विषयको यथार्थ रूपसे सुनना चाहता हूँ ।। ६ ।। किं सुवर्णं कथं जातं कस्मिन् काले किमात्मकम् । किं दैवं किं फलं चैव कस्माच्च परमुच्यते ।। ७ ।। सुवर्ण क्या है? कब और किस तरहसे इसकी उत्पत्ति हुई? सुवर्णका उपादान क्या है? इसका देवता कौन है? इसके दानका फल क्या है? सुवर्ण क्यों उत्तम कहलाता है? ।। ७ ।। कस्माद् दानं सुवर्णस्य पूजयन्ति मनीषिणः । कस्माच्च दक्षिणार्थं तद् यज्ञकर्मसु शस्यते ।। ८ ।। मनीषी विद्वान् सुवर्णदानका अधिक आदर क्यों करते हैं? तथा यज्ञ-कर्मोंमें दक्षिणाके लिये सुवर्णकी प्रशंसा क्यों की जाती है? ।। ८ ।। कस्माच्च पावनं श्रेष्ठं भूमेर्गोभ्यश्च काञ्चनम् । परमं दक्षिणार्थे च तद् ब्रवीहि पितामह ।। ९ ।। पितामह! क्यों सुवर्ण पृथ्वी और गौओंसे भी पावन और श्रेष्ठ है? दक्षिणाके लिये सबसे उत्तम वह क्यों माना गया है? यह मुझे बताइये ।। ९ ।।
भीष्म उवाच
शृणु राजन्नवहितो बहुकारणविस्तरम् । जातरूपसमुत्पत्तिमनुभूतं च यन्मया ।। १० ।। **भीष्मजीने कहा—**राजन्! ध्यान देकर सुनो! सुवर्णकी उत्पत्तिका कारण बहुत विस्तृत है। इस विषयमें मैंने जो अनुभव किया है, उसके अनुसार तुम्हें सब बातें बता रहा हूँ ।। १० ।। पिता मम महातेजाः शान्तनुर्निधनं गतः । तस्य दित्सुरहं श्राद्धं गंगाद्वारमुपागमम् ।। ११ ।। मेरे महातेजस्वी पिता महाराज शान्तनुका जब देहावसान हो गया तब मैं उनका श्राद्ध करनेके लिये गंगाद्वार तीर्थ (हरद्वार)-में गया ।। ११ ।। तत्रागम्य पितुः पुत्र श्राद्धकर्म समारभम् । माता मे जाह्नवी चात्र साहाय्यमकरोत् तदा ।। १२ ।। बेटा! वहाँ पहुँचकर मैंने पिताका श्राद्धकर्म आरम्भ किया। इस कार्यमें वहाँ उस समय मेरी माता गंगाने भी बड़ी सहायता की ।। १२ ।। ततोऽग्रतस्ततः सिद्धानुपवेश्य बहून्ऋषीन् । तोयप्रदानात् प्रभृति कार्याण्यहमथारभम् ।। १३ ।। तदनन्तर अपने सामने बहुत-से सिद्ध-महर्षियोंको बिठाकर मैंने जलदान आदि सारे कार्य आरम्भ किये ।। १३ ।।