भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 732, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 732

‘देवताओ! मेरे पतिदेव मुझसे संतान उत्पन्न करना चाहते थे, किंतु तुमलोगोंने इन्हें इस कार्यसे निवृत्त कर दिया; इसलिये तुम सभी देवता निर्वंश हो जाओगे ।। प्रजोच्छेदो मम कृतो यस्माद् युष्माभिरद्य वै । तस्मात् प्रजा वः खगमाः सर्वेषां न भविष्यति ॥ ७५ ॥ ‘आकाशचारी देवताओ! आज तुम सब लोगोंने मिलकर मेरी संततिका उच्छेद किया है; अतः तुम सब लोगोंके भी संतान नहीं होगी' ।। ७५ ।। पावकस्तु न तत्रासीच्छापकाले भृगूद्वह । देवा देव्यास्तथा शापादनपत्यास्ततोऽभवन् ॥ ७६ ॥ भृगुश्रेष्ठ! उस शापके समय वहाँ अग्निदेव नहीं थे; अतः उनपर यह शाप लागू नहीं हुआ। अन्य सब देवता देवीके शापसे संतानहीन हो गये ।। ७६ ।। रुद्रस्तु तेजोऽप्रतिमं धारयामास वै तदा । प्रस्कन्नं तु ततस्तस्मात् किंचित्तत्रापतद् भुवि ॥ ७७ ॥ रुद्रदेवने उस समय अपने अनुपम तेज (वीर्य) को यद्यपि रोक लिया था; तो भी किंचित् स्खलित होकर वहीं पृथ्वीपर गिर पड़ा ।। ७७ ।। उत्पपात तदा वह्नौ ववृधे चाद्भुतोपमम् । तेजस्तेजसि संयुक्तमात्मयोनित्वमागतम् ॥ ७८ ॥ वह अद्भुत तेज अग्निमें पड़कर बढ़ने और ऊपरको उठने लगा। तेजसे संयुक्त हुआ वह तेज एक स्वयम्भू पुरुषके रूपमें अभिव्यक्त होने लगा ।। ७८ ।। एतस्मिन्नेव काले तु देवाः शक्रपुरोगमाः । असुरस्तारको नाम तेन संतापिता भृशम् ॥ ७९ ॥ इसी समय तारक नामक एक असुर उत्पन्न हुआ था, जिसने इन्द्र आदि देवताओंको अत्यन्त संतप्त कर दिया था ।। ७९ ।। आदित्या वसवो रुद्रा मरुतोऽथाश्विनावपि । साध्याश्च सर्वे संत्रस्ता दैतेयस्य पराक्रमात् ॥ ८० ॥ आदित्य, वसु, रुद्र, मरुद्गण, अश्विनीकुमार तथा साध्य—सभी देवता उस दैत्यके पराक्रमसे संत्रस्त हो उठे थे ।। ८० ।। स्थानानि देवतानां हि विमानानि पुराणि च । ऋषीणां चाश्रमाश्चैव बभूवुरसुरैर्हृताः ॥ ८१ ॥ असुरोंने देवताओंके स्थान, विमान, नगर तथा ऋषियोंके आश्रम भी छीन लिये थे ।। ८१ ।। ते दीनमनसः सर्वे देवता ऋषयश्च ये । प्रजग्मुः शरणं देवं ब्रह्माणमजरं विभुम् ॥ ८२ ॥

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