भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 734, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 734

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पञ्चाशीतितमोऽध्यायः

ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध

देवा ऊचुः असुरस्तारको नाम त्वया दत्तवरः प्रभो । सुरानृषींश्च क्लिश्नाति वधस्तस्य विधीयताम् ॥ १ ॥ देवता बोले— प्रभो! आपने जिसे वर दे रखा है, वह तारक नामक असुर देवताओं और ऋषियोंको बड़ा कष्ट दे रहा है। अतः उसके वधका कोई उपाय कीजिये ॥ १ ॥

तस्माद् भयं समुत्पन्नमस्माकं वै पितामह । परित्रायस्व नो देव न ह्यन्या गतिरस्ति नः ॥ २ ॥ पितामह! देव! उस असुरसे हमलोगोंको भारी भय उत्पन्न हो गया है। आप हमारी उससे रक्षा करें; क्योंकि हमारे लिये दूसरी कोई गति नहीं है ॥ २ ॥

ब्रह्मोवाच समोऽहं सर्वभूतानामधर्मं नेह रोचये । हन्यतां तारकः क्षिप्रं सुरर्षिगणबाधिता ॥ ३ ॥ ब्रह्माजीने कहा— मेरा तो समस्त प्राणियोंके प्रति समान भाव है तथापि मैं अधर्म नहीं पसन्द करता; अतः देवताओं तथा ऋषियोंको कष्ट देनेवाले तारकासुरको तुम लोग शीघ्र ही मार डालो ॥ ३ ॥

वेदा धर्माश्च नोच्छेदं गच्छेयुः सुरसत्तमाः । विहितं पूर्वमेवात्र मया वै व्येतु वो ज्वरः ॥ ४ ॥ सुरश्रेष्ठगण! वेदों और धर्मोंका उच्छेद न हो, इसका उपाय मैंने पहलेसे ही कर लिया है। अतः तुम्हारी मानसिक चिन्ता दूर हो जानी चाहिये ॥ ४ ॥

देवा ऊचुः वरदानाद् भगवतो दैतेयो बलगर्वितः ।