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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 739, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 739

ऐसा कहकर हाथीद्वारा सूचित किये गये अग्निदेव अश्वत्थसे निकलकर शमीके भीतर प्रविष्ट हो गये। वे वहाँ अच्छी तरह सोना चाहते थे ।। ३६ ।। अनुग्रहं तु नागानां यं चक्रुः शृणु तं प्रभो। देवा भृगुकुलश्रेष्ठ प्रीत्या सत्यपराक्रमाः ।। ३७ ।। प्रभो! भृगुकुलश्रेष्ठ! तब सत्यपराक्रमी देवताओंने प्रसन्न हो नागोंपर जिस प्रकार अपना अनुग्रह प्रकट किया, उसे सुनो ।। ३७ ।।

देवा ऊचुः प्रतीपया जिह्वयापि सर्वाहारीं करिष्यथ। वाचं चोच्चारयिष्यध्वमुच्चैरव्यज्जिताक्षराम् ।। ३८ ।। **देवता बोले—**हाथियो! तुम अपनी उलटी जिह्वासे भी सब प्रकारके आहार ग्रहण कर सकोगे तथा उच्चस्वरसे वाणीका उच्चारण कर सकोगे; किंतु उससे किसी अक्षरकी अभिव्यक्ति नहीं होगी ।। ३८ ।।

इत्युक्त्वा पुनरेवाग्निमनुसस्रुर्दिवौकसः। अश्वत्थान्निःसृतश्चाग्निः शमीगर्भमुपाविशत् ।। ३९ ।। ऐसा कहकर देवताओंने पुनः अग्निका अनुसरण किया। उधर अग्निदेव अश्वत्थसे निकलकर शमीके भीतर जा बैठे ।। ३९ ।।

शुकेन ख्यापितो विप्र तं देवाः समुपाद्रवन् । शशाप शुकमग्निस्तु वाग्विहीनो भविष्यसि ।। ४० ।। विप्रवर! तदनन्तर तोतेने अग्निका पता बता दिया। फिर तो देवता शमीवृक्षकी ओर दौड़े। यह देख अग्निने तोतेको शाप दे दिया—'तू वाणीसे रहित हो जायगा' ।।

जिह्वामावर्तयामास तस्यापि हुतभुक् तथा। दृष्ट्वा तु ज्वलनं देवाः शुकमूचुर्दयान्विताः ।। ४१ ।। भविता न त्वमत्यन्तं शुकत्वे नष्टवागिति। आवृत्तजिह्वस्य सतो वाक्यं कान्तं भविष्यति ।। ४२ ।। अग्निदेवने उसकी भी जिह्वा उलट दी। अब अग्निदेवको प्रत्यक्ष देखकर देवताओंने दयायुक्त होकर शुकसे कहा—'तू शुकयोनिमें रहकर अत्यन्त वाणीरहित नहीं होगा—कुछ-कुछ बोल सकेगा। जीभ उलट जानेपर भी तेरी बोली बड़ी मधुर एवं कमनीय होगी ।।

बालस्येव प्रवृद्धस्य कलमव्यक्तमद्भुतम्। 'जैसे बड़े-बूढ़े पुरुषको बालककी समझमें न आनेवाली अद्भुत तोतली बोली बड़ी मीठी लगती है, उसी प्रकार तेरी बोली भी सबको प्रिय लगेगी' ।। ४२ १/२ ।।

इत्युक्त्वा तं शमीगर्भे वह्निमालक्ष्य देवताः ।। ४३ ।। तदेवायतनं चक्रुः पुण्यं सर्वक्रियास्वपि।