महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 755, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंपुण्यलोक प्राप्त होते हैं ॥ १५९ ॥
यस्तु संजनयित्वाग्निमादित्योदयनं प्रति ।
दद्याद् वै व्रतमुद्दिश्य सर्वकामान् समश्नुते ॥ १६० ॥
जो मनुष्य सूर्योदयके समय अग्नि प्रकट करके किसी व्रतके उद्देश्यसे सुवर्णदान करता है, वह सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है ॥ १६० ॥
अग्निरित्येव तत् प्राहुः प्रदानं च सुखावहम् ।
यथेष्टगुणसंवृत्तं प्रवर्तकमिति स्मृतम् ॥ १६१ ॥
सुवर्णको अग्निस্বরূপ ही कहते हैं। उसका दान सुख देनेवाला होता है। वह यथेष्ट पुण्यको उत्पन्न करने-वाला और दानेच्छाका प्रवर्तक माना गया है ॥ १६१ ॥
एषा सुवर्णस्योत्पत्तिः कथिता ते मयानघ ।
कार्तिकेयस्य च विभो तद् विद्धि भृगुनन्दन ॥ १६२ ॥
प्रभो! निष्पाप भृगुनन्दन! यह मैंने तुम्हें सुवर्ण और कार्तिकेयकी उत्पत्ति बतायी है। इसे अच्छी तरह समझ लो ॥ १६२ ॥
कार्तिकेयस्तु संवृद्धः कालेन महता तदा ।
देवैः सेनापतित्वेन वृतः सेन्द्रैर्भृगूहह ॥ १६३ ॥
भृगुश्रेष्ठ! कार्तिकेय जब दीर्घकालमें बड़े हुए तब इन्द्र आदि देवताओंने उनका अपने सेनापतिके पदपर वरण किया ॥ १६३ ॥
जघान तारकं चापि दैत्यमन्यांस्तथासुरान् ।
त्रिदशेन्द्राज्ञया ब्रह्मँल्लोकानां हितकाम्यया ॥ १६४ ॥
ब्रह्मन्! उन्होंने लोकोंके हितकी कामना एवं देवराज इन्द्रकी आज्ञासे प्रेरित हो तारकासुर तथा अन्य दैत्योंका संहार कर डाला ॥ १६४ ॥
सुवर्णदाने च मया कथितास्ते गुणा विभो ।
तस्मात् सुवर्णं विप्रेभ्यः प्रयच्छ ददतां वर ॥ १६५ ॥
प्रभो! दाताओंमें श्रेष्ठ! इस प्रकार मैंने तुम्हें सुवर्णदानका माहात्म्य बताया है। इसलिये अब तुम ब्राह्मणोंको सुवर्णका दान करो ॥ १६५ ॥
भीष्म उवाच
इत्युक्तः स वसिष्ठेन जामदग्न्यः प्रतापवान् ।
ददौ सुवर्णं विप्रेभ्यो व्यमुच्यत च किल्बिषात् ॥ १६६ ॥
भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! वसिष्ठजीके ऐसा कहनेपर प्रतापी परशुरामजीने ब्राह्मणोंको सुवर्णका दान किया। इससे वे सब पापोंसे छुटकारा पा गये ॥
एतत् ते सर्वमाख्यातं सुवर्णस्य महीपते ।
प्रदानस्य फलं चैव जन्म चास्य युधिष्ठिर ॥ १६७ ॥