महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 777, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंतन्नैव देवान् न पितॄनुपैति । तथा दत्तं नर्तने गायने च यां चानृते दक्षिणामावृणोति ॥ ४७ ॥ उभौ हिनस्ति न भुनक्ति चैषा या चानृते दक्षिणा दीयते वै । आघातिनी गर्हितैषा पतन्ती तेषां प्रेतान् पातयेद् देवयानात् ॥ ४८ ॥ जैसे आग बुझ जानेपर जो घृतका हवन किया जाता है, उसे न देवता पाते हैं, न पितर; उसी प्रकार नाचनेवाले, गवैये और झूठ बोलनेवाले अपात्र ब्राह्मणको दिया हुआ दान निष्फल होता है। अपात्र पुरुषको दी हुई दक्षिणा न दाताको तृप्त करती है न दान लेनेवालेको; प्रत्युत दोनोंका ही नाश करती है। यही नहीं, वह विनाशकारिणी निन्दित दक्षिणा दाताके पितरोंको देवयान-मार्गसे नीचे गिरा देती है ॥ ४७-४८ ॥
ऋषीणां समये नित्यं ये चरन्ति युधिष्ठिर । निश्चिताः सर्वधर्मज्ञास्तान् देवा ब्राह्मणान् विदुः ॥ ४९ ॥ युधिष्ठिर! जो सदा ऋषियोंके बताये हुए धर्ममार्गपर चलते हैं, जिनकी बुद्धि एक निश्चयपर पहुँची हुई है तथा जो सम्पूर्ण धर्मोंके ज्ञाता हैं, उन्हींको देवतालोग ब्राह्मण मानते हैं ॥ ४९ ॥
स्वाध्यायनिष्ठा ऋषयो ज्ञाननिष्ठास्तथैव च । तपोनिष्ठाश्च बोद्धव्याः कर्मनिष्ठाश्च भारत ॥ ५० ॥ भारत! ऋषि-मुनियोंमें किन्हींको स्वाध्यायनिष्ठ, किन्हींको ज्ञाननिष्ठ, किन्हींको तपोनिष्ठ और किन्हींको कर्मनिष्ठ जानना चाहिये ॥ ५० ॥
कव्यानि ज्ञाननिष्ठेभ्यः प्रतिष्ठाप्यानि भारत । तत्र ये ब्राह्मणान् केचिन्न निन्दन्ति हि ते नराः ॥ ५१ ॥ भरतनन्दन! उनमें ज्ञाननिष्ठ महर्षियोंको ही श्राद्धका अन्न जिमाना चाहिये। जो लोग ब्राह्मणोंकी निन्दा नहीं करते, वे ही श्रेष्ठ मनुष्य हैं ॥ ५१ ॥
ये तु निन्दन्ति जल्पेषु न ताञ्छ्राद्धेषु भोजयेत् । ब्राह्मणा निन्दिता राजन् हन्युस्त्रैपुरुषं कुलम् ॥ ५२ ॥ वैखानसानां वचनमृषीणां श्रूयते नृप । दूरादेव परीक्षेत ब्राह्मणान् वेदपारगान् ॥ ५३ ॥ राजन्! जो बातचीतमें ब्राह्मणोंकी निन्दा करते हैं, उन्हें श्राद्धमें भोजन नहीं कराना चाहिये। नरेश्वर! वानप्रस्थ ऋषियोंका यह वचन सुना जाता है कि 'ब्राह्मणोंकी निन्दा होनेपर वे निन्दा करनेवालेकी तीन पीढ़ियोंका नाश कर डालते हैं।' वेदवेत्ता ब्राह्मणोंकी दूरसे ही परीक्षा करनी चाहिये ॥ ५२-५३ ॥