महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 791, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंअभक्षयन् वृथा मांसममांसाशी भवत्युत ।
दानं ददत् पवित्री स्यादस्वप्रश्च दिवास्वपन् ॥ १२ ॥
जो मांस नहीं खाता, वह अमांसाशी होता है और जो सदा दान देनेवाला है, वह पवित्र माना जाता है। जो दिनमें नहीं सोता वह सदा जागनेवाला माना जाता है ॥ १२ ॥
भृत्यातिथिषु यो भुंक्ते भुक्तवत्सु नरः सदा ।
अमृतं केवलं भुंक्ते इति विद्धि युधिष्ठिर ॥ १३ ॥
युधिष्ठिर! जो सदा भृत्यों* और अतिथियोंके भोजन कर लेनेके बाद ही स्वयं भोजन करता है, उसे केवल अमृत भोजन करनेवाला (अमृताशी) समझना चाहिये ॥ १३ ॥
अभुक्तवत्सु नाश्नाति ब्राह्मणेषु तु यो नरः ।
अभोजनेन तेनास्य जितः स्वर्गो भवत्युत ॥ १४ ॥
जबतक ब्राह्मण भोजन नहीं कर लें तबतक जो अन्न ग्रहण नहीं करता, वह मनुष्य अपने उस व्रतके द्वारा स्वर्गलोकपर विजय पाता है ॥ १४ ॥
देवेभ्यश्च पितृभ्यश्च संश्रितेभ्यस्तथैव च ।
अवशिष्टानि यो भुंक्ते तमाहुर्विघसाशिनम् ॥ १५ ॥
तेषां लोका ह्यपर्यन्ताः सदने ब्रह्मणः स्मृताः ।
उपस्थिता ह्यप्सरसो गन्धर्वैश्च जनाधिप ॥ १६ ॥
नरेश्वर! जो देवताओं, पितरों और आश्रितोंको भोजन करानेके बाद बचे हुए अन्नको ही स्वयं भोजन करता है उसे विघसाशी कहते हैं। उन मनुष्योंको ब्रह्मधाममें अक्षय लोकोंकी प्राप्ति होती है तथा गन्धर्वोंसहित अप्सराएँ उनकी सेवामें उपस्थित होती हैं ॥
देवतातिथिभिः सार्धं पितृभ्यश्चोपभुञ्जते ।
रमन्ते पुत्रपौत्रेण तेषां गतिरनुत्तमा ॥ १७ ॥
जो देवताओं और अतिथियोंसहित पितरोंके लिये अन्नका भाग देकर स्वयं भोजन करते हैं, वे इस जगत्में पुत्र-पौत्रोंके साथ रहकर आनन्द भोगते हैं और मृत्युके पश्चात् उन्हें परम उत्तम गति प्राप्त होती है ॥ १७ ॥
युधिष्ठिर उवाच
ब्राह्मणेभ्यः प्रयच्छन्ति दानानि विविधानि च ।
दातृप्रतिग्रहीत्रोर्वै को विशेषः पितामह ॥ १८ ॥
युधिष्ठिरने पूछा—पितामह! लोग ब्राह्मणोंको नाना प्रकारकी वस्तुएँ दान करते हैं। दान देने और दान लेनेवाले पुरुषोंमें क्या विशेषता होती है? ॥ १८ ॥
भीष्म उवाच
साधोर्यः प्रतिगृह्णीयात् तथैवासाधुतो द्विजः ।
गुणवत्यल्पदोषः स्यान्निर्गुणे तु निमज्जति ॥ १९ ॥